अंधेरे पर हँसता हूँ

काली स्याह अमावस
घनकूप अंधेरी सारी रात,
बेसुरा गीत गाती
सूरज की आहट से
कोने में छिप जाती।

भोर एक सुनहरी
लालिमा के साथ
सूरज का उगना ही
याद रखा करता हूँ,
उत्पाती ऊधमी अंधेरे पर
मैं अक्सर हँसा करता हूँ।

उदण्ड शैतान अंधेरा
क्यों बाज नहीं आता
जुगनुओं के समक्ष भी
जो ठहर नहीं पाता
सूरज के उगने को
रहता है झुठलाता।

अंधेरे में चमकते जुगनू