अ-घोर

मेरी ख्वाहिश 
पतंग सा रहूँ
कुछ मलंग सा भी
रंग मेरे बस अपने हो 
पिपासा की छाप कुछ 
प्रभु तेरी हो.. वजूद मेरा 
भले ही ना तेरा संग हो 
आवाज तो गुंजती 
मेरे मन मानस में  
युगो सी तरंग सी 
ये तन क्या
आज है कल फना 
मैं मेरा
मुझ मे ही मर चला 

मै तो रंग सा घुल जाऊँगा
बारिश सा धुल  जाऊँगा
11 March 2018

जो घोर नहीं, सहज सरल —- अ-घोर