उथल - पुथल

नैनों से
नीर बहे
अनगिनत
बात कहे
कोई तो हो
सुनने वाला
कोई तो हो
पोंछने वाला
अकेलापन
क्यूँ सहे
किसको मैं
अपना कहे
धूप, छाँव में 
बह जाता दिन
आ जाती है रात बड़ी
बढ़ता रहता
खुशी न जाने
किसी मोड़ पर मिले खड़ी।
 
विडंबना है
हर कोई
मूक बना है
किसी के
मन में द्वेष
किसी का
झूठा भेष
कभी अपना
कभी पराया बनके
हर कोई
छल रहा है
आँखों से
रिसते भाव
शायद
कोई अपना
समझ पाये
शायद
मेरे दुख को
जान पाये
मेरे अंदर
क्या क्या
उथल-पुथल है
शायद
कोई जान पाये
3 October 2015

कुंडली के ग्रहों का उथल-पुथल