उमंगों में गीत ही जीवन है

स्वतः का होना
यह अहसास जिन्दा है
हर झंझावात के बीच
कोई एक आस जिन्दा है,
जीना सिर्फ मन की,
 बेराह उमंगों से नहीं
उमंगों में गीत ही जीवन है।

वह चाँद था
वह चाँद है
उसका चाँद होना
एक सच है,
मैं सूरज
अपनी आग बुझा
अब उस चाँद का
दाग बन बैठा।

कामनाएं जब प्रबल होने लगीं
जंजीरों में जकड़ी थीं तब इच्छाएं
मौन बेपरवाह चीखता रहा
हौसला तब भी, मगर खामोश था।

रात दिन झूठ
झूठ और बस झूठ
मन से पढ़ते हैं
मन से देखते हैं
मन से कहते हैं
और
मन से ही सुनते हैं
बुद्धि की खता को फिर
सिर पर क्यों मढ़ते हैं?

जीवन : उमंगों की गीत