एक गहरी साँस

एक गहरी
साँस के साथ
उखड़ी हुई तन्हाई में
अपने को याद करता हूँ
मैं खोज रहा
अस्तित्व को
जाने कहाँ है
ठिकाना मेरा
हर रोज़ मिलता
नया नाम मुझे
हर नाम से रिश्ता
है पुराना अपना ।

स्वयंभू होकर
स्वतः रगों में
दौड़ता जीवन
साँझ के
सबसे बड़े
तारे सा
उदित होकर
ढल जाता है
अंधेरों में
और नन्हीं
हथेली में
रखा सूरज
चमक उठता है
एक मुस्कान के साथ ।।
11 October 2015

एक बाहरी साँस