एक ग्राम्या का होना

सुबह...
थोड़ा देर से उठी स्त्री
सास की फटकार सुनते ही
स्नान करके चूल्हा फूँक देती है

दोपहर...
रोते बिलखते बच्चे को देख
नजर उतारने को
अग्नि में मिर्ची झोंक देती है

शाम...
ननद देवरों की नोकझोंक में
थोड़े खुशी के पलों को जीती है
पड़ोसी भाभियों से सुख दुख बाँट लेती है

रात...
प्यार के कुछ शब्दों की आस लगाए स्त्री
जब रात के खाने में नमक ज्यादा हो जाने पे
पति के ताने सुनती है तो आँसुओं के घूँट नहीं पीती
सलाद में प्याज काट देती है

गाँव में पली-बधी ग्राम्य-बालाएँ
सारे हुनर जानती हैं .... !!!

तभी तो.......
अठखेलियाँ करती
तिरछी नज़रें घूमाती
दोनों हाथों ऊपर को ऊपर उठा
हथेलियों को सटा
अँगूलियों में अँगूलियों का पेंच फंसा
तन के ऊपर मन की अँगड़ाई लेती
निश्छल हृदय आह्लादित चित
उच्छवासों के साथ जो ....
“ग्राम्या” कहलाती है !!!