एक थी मीरा

एक थी मीरा
गिरीधर नागर
तुम कहलाये
मेरे ठाकुर
प्रेम की लीला
ऐसी रचाई
भक्त के रूप मे
खिची चली आई

वह थी मीरा
प्रकाश वो
जो भीतर है भरा
नित उसको
देखना चाहूँ रे
धुन वो
जो भीतर बजे
मै उस पे 
नाचना चाहूँ रे
रिश्ता जो
ईश्वर से है
मै उसको
निभाना चाहूँ रे
एक थी मीरा
27 October 2015

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