एक लम्बा अरसा

एक लम्बा अरसा जिया है
मेरे शब्दों ने
अँधेरी गुफाओं में
ब्रह्ममुहूर्त में करके
पीड़ा से स्नान
किया है शुद्ध
अपने अस्तित्व को
खुद ही किया है प्रज्वलित
खुद को शब्द अग्नि में
और खुद ही अर्पण किया
खुद को
वाणी - विचारों के चरणों में
प्रकृति के आँगन से
चुराया था मैंने
कुछ चमचमाते शब्द
कुछ पंक्तियाँ
लिया था हवा के
घरौंदे से उधार
कुछ शब्द तो
मुझे चाँद ने दिया
तोहफे में .. और
बहुत सारी
टूटे फूटे शब्द - पंक्तियाँ
बरसाये थे
बादलों ने मुझपे
बीते वर्षों से
जन्म मरण के पदचिन्हों पे
खुद को लिखा और मिटाया
मेरे शब्दों ने
पवन, नदी, प्रपातों के 
शोर से लेकर
पंछियों के कलरव और
मरघट की चीख पुकारों तक
भटके हैं मेरे शब्द
तलाश में अपने मोक्ष के
टेसू चम्पा के फूलों में
पलाश की टहनियों में
अटके मेरे इन शब्दों को
अब धरा के अंत तक भी
नहीं मिलेगा मोक्ष
वे शब्द मेरी लेखनी का
वो अंश हैं
जिनको कभी लिखा ही नहीं
वैसे कहने को तो
कुछ भी नहीं
पर लिखने को
अब बहुत कुछ
अवशेष है