कर्मयोग

कि उसने सुनिश्चित किया है;
कि हम सब अपनी अपनी;
कथाओं में एकाकी हैं;
कि ये यात्रा भी एकाकी है;
सुख-दुःख, आहें, साँसे;
सब एकाकी है।

इसीलिए
तुम्हारी चुनौतियों को स्वीकारा हूँ।
हे प्रभु ! हे माधव!
सुनो जब अकेला होता हूँ;
नहीं पुकारता तुम्हें;
जीता हूँ अपना एकाकीपन;
सिरहाने कभी उदासी,
कभी स्मृति, कभी कोई..
कविता विछाकर।
पर ये गुमान न करना, जो
तुमने गीता में कहा है कि
तुम्हारे “कर्मयोग” का दास हूँ।

नहीं करता हूँ स्मरण तुम्हारा;
फिर भी खुद के द्वंदों में;
उठकर खड़ा होता हूँ;
एक भारी अट्टहास, कि
मन्द मुस्कराहट के साथ।

हरि ने छिपकर,
मुग्ध दृष्टि डाली थी।
रात यदि श्याम नहीं आये,
तो मैं इतने गीत सुहाने,
किसके संग गाए।

हरि ने छिपकर
मुग्ध दृष्टि डाली थी
रात यदि श्याम नहीं आये,तो
मैं इतने गीत सुहाने किसके संग गाए !!