क़लम की पूर्णाहुति

क़लम से क्या लिखूँगा मैं,
कलम खुद लिखती है मुझे।
सब सोचते हैं कि खुद;
कलम से लिखता हूँ।
हकीकत कुछ और है;
मुझे कलम ही लिखती है।

 

मैं होता हूँ जब अपने ही;
कामों के ख़यालों में;
अँगुली पकडके खींच मुझे;
एक कागज थमाती है।
बैठ कुछ बुनने का अब तक;
कभी कोई मौका न मिला।
कलम खुद ही हर तरफ से;
बहुतेरे किस्से ढूंढ लाती है।

ये यादों की खूबी है;
या मंज़िल की चाहत है।
कि फड़कते अधर जब;
अपनी कहानी सुनाते हैं।
तब हर झपकते पलक;
अपनी बेबसी दिखाते हैं।

जब भी मैं खोजता हूँ;
राह एक पहचान की।
हर गुज़रती बयार मुझे;
गुमराह करके जाती है।
कलम खुद ही हर पन्नों में;
मुझे किस्सा बना कर जाती है।

किसी ने कहा;
कलम मन की बयार है;
झिलमिलाते सरोवर मे;
परछाई है;
या
झँझावातोँ के वन मे;
राही को दिशा देती पगडँडी,
बढना पथिक की नियति है…

पर कलम
तन्हाई में
एक खामोश भीड़ है;
खामोशियों में;
प्रवाहमय थिरकती;
लहराती स्वर है वो;
रुकी हुई साँसों में भी;
हृदय की धौंकनी है;
रुंधे हुए कंठों में भी;
विस्मय से खुले बोध के;
होंठ और नयन है वो।

कलम वो यादगार है;
कलम वो नयन है;
जो सब देख लेती;
सारे दर्द पढ़ लेती;
और
सारी उमर साथ देती।