काल के गाल से

काल के गाल से, सरासर
निकलता जा रहा हूँ।
दिखते हैं दानव कहीं,
दानव जो देखते नहीं,
मैं तो अपनी सीधे नजर के,
सामने से निकलता जा रहा हूँ।
दानव भी सर झुकाये, मुँह छिपाए
पगडंडियों के रास्ते निकलते जाते हैं।

पता न,
सीधी नजर चलते मैं डर रहा,
कि मुँह छिपाए, सर झुकाये
पगडंडियों से खिसकते वे डर रहे।
रात के सन्नाटे में,
घनघोर कूप अंधेरी इस रात में,
जीरम घाटी में सनसनाती हवा
के, भयानक व करुण शोर में,
सीधे चलता बाघ हूँ मैं, कि
जंगल की पगडंडियों पर,
घिसकते दानव शेर हैं।

उनकी दानवी उच्छवासें,
दरभा से जीरम तक,
छाई हुई है।
तो सत्य के पंजे,
बस्तर की शान्ति समृधि हेतु,
फैले हुये हैं।
एक वह भी समय था,
कभी बड़े ही निकट से,
देखा हूँ गरजती हुई बंदूकों को,
सर झुकाये, मुँह छुपाये,
पगडंडियों से खिसकते हुए।
पिपराढ़ी सुल्तान की स्तब्धता,
दानवी उच्छ्वासों से भरी,
बागमती-बकैया का छाडन,
तब चलते हुए मेरे कदमों से,
टूटी थी वह नीरवता।
हिलते हुए मेरे पंजों से,
छटे थे उन उच्छ्वासों की,
काली जहरीली धुँआ भी ।