को बरनै ब्रज धाम

ब्रज रज जाकूँ मिल गयी,
वाकी चाह न शेष।।
ब्रज की चाहत मैं रहैं,
ब्रह्माँ विष्णु महेश ।।
ब्रज के रस कूँ जो चखै,
चखै न दूसरो स्वाद।।
एक बार राधे कहै,
तौ रहै न कछु और याद।।
ब्रज की महिमा को कहै,
को बरनै ब्रज धाम ।।
जहाँ बसत हर साँस मैं,
श्री राधे और श्याम ।।