क्या खोया ..... क्या पाया

कोरोना कोरोंटिन काल की क्षणिकाएँ
       कुछ अपनी कुछ औरों की
                  ~१~
इस  नदी की  धार से ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
~दुष्यंत कुमार @स्वास्थ्य_व्यवस्था

                    ~२~
वह क्या  बताए  कैसी  परेशानियों  में  है,
काग़ज़ की एक नाव है और पानियों में है....  

@कोविड19_Delhi

                    ~३~
परिंदे भी नहीं रहते पराए आशियानों  में,
हमारी उम्र गुजरती है किराए के मकानों में।

                       ~४~
      शाम से पेड़ पे फिर मातम है।
      आज फिर एक परिंदा कम है।।

                    ~५~
    ज़िंदगी शायद इसी का नाम है,
  दूरियाँ    मजबूरियाँ   तन्हाइयाँ....।
    @कोविड19

                     ~६~
नक़्शा  उठा  के  कोई  नया शहर ढूँढे,
इस शहर में तो अब मुलाक़ात पर भी वन्दिश हो गई ....
@Delhi_in_Lockdown

                   ~७~
वह क्या बोले, ना उसके, ना मेरे दुख में कोई भेद।
    एक उफनती नदी सामने और नाव में छेद ।।

                          ~८~
(कोरोंटिन से बाहर आने के पश्चात)

“तेज़ी से एक दर्द मन में जागा
मैंने पी लिया
छोटी सी एक खुशी अधरों में आई
मैंने उसे फैला दिया,
मुझको संतोष हुआ
और लगा-
हर छोटे को बड़ा करना
धर्म है।”
~ दुष्यंत कुमार