ख़ामोशियाँ ही बेहतर

स्वयंभू होकर
स्वतः रगों में
दौड़ता जीवन
साँझ के
सबसे बड़े
तारे सा
उदित होकर
ढल जाता है
अंधेरों में
और नन्हीं
हथेली में
रखा सूरज
चमक उठता है
एक मुस्कान के साथ।

हम कितने जल रहे हैं
साथ चलते चलते
जहरीले साँप
आस्तीनों में पल रहे हैं
इनका जहर निकालें तो कैसे
जहाँ राजपथ के मार्ग
इनके इसारों से ढल रहे हैं।

एक सोच ......
खामोशियाँ ही बेहतर है ,,,,
बल्कि बेहतरीन है....
लफ्जों से तो
लोग रूठते ही बहुत हैं .।
9 October 2015

फ़र्क़ बहुत है तेरी और
मेरी तालीम में,
तूने उस्तादों से सिखा है और
मैंने हालातों से।