ख़ामोशी ही बेहतर है

यों भी
समय गुज़र गया
अपने अक्स ही ढालने में
जो ढल गए,वे अपने न हुए।
जो साँसों में हैं
वे ढले कभी नहीं

मेरा मन कहता है
ख़ामोशियाँ ही बेहतर है
शब्दों से लोग रूठते बहुत हैं

कितना भी समेट लूँ
हाथों से फिसलेगा ज़रूर
ये वक़्त है साहब
बदलेगा ज़रूर