खोजता किनारा

पहाड़ों से निकला
एक जलस्रोत
उद्गम से विश्राम तक
सुबह से शाम तक
खोजता किनारा
आस के सहारा
देह की पतवार लिए
उम्र की नाव--निगोडी
अनुभव से लद
बालकपन की
जलधारा से आगे बढ़
मुक्त यौवना-नदी
वह कहलाने लगी
उमड़ते जलधार के
नादित उठते कलरव
शीशों से सपने
यादों के पत्थर
नेह के काबिल 
ईन्सां हैं कमतर
गम में हैं : तनहा
खुशियों की खातिर
जुट आयेंगे सभी
26 November 2015

अद्भुत जलस्रोत --मनुष्य की कहानी