गुज़री ज़िन्दगी

देखा जो पलट के
क्या जिंदगी गुजारी है,
कौन कहता है, मेरी है
हर तस्वीर में हँसते
गैर लम्हो की उधारी है,
हर हिस्सा, कई किस्से
मेरे हिस्से जो आया है,
अधूरी हिस्सेदारी है।

ढलता सूरज छिप
गया रवानी से।
उतर आयी हो
शाम जैसे इस पानी में।
दो किनारे क्यूँ हैं
इस तरह जुदा,
क्या कोई तूफ़ान है
इस ख़ामोश पानी में ?
लुटेरों की जमात है,
वंश विलास उन्माद है,
नट नटिनियो की
सजती महफ़िल,
रंगीन रातो में विकास है।

जो हो मानव, तो अाओ !
खुद को ढूंढ लेते हैं ।
अंधेरी सुबहों की किरण-
को , खून देते हैं ।
मन के कोनों में छिपे
अमानुषी खार सब
छाँट देते हैं ।
घृणा दुराव के दानव की
चाल हर काट देते हैं ।
प्रेम , दया , सदभाव की
श्रावण की पवित्र श्रावणी
और अनुपम ख़ुशियों की
दीपावली मनाते हैं।