घर

लोग कहते हैं;
हम घर में सो रहे हैं।
मैं तो…
अकेलेपन के अँधेरे में खो रहा हूँ।
समय के साथ;
दर्द भी छुपाता हूँ (और);
मरहम भी लगाता हूँ;
पर हम दरअसल ;
दीवारों में घर ढो रहे हैं।

जो कुछ भी अरमान है;
खैर यूँ तो;
वो मगर झूमर पर झूल रहे हैं।
एक कहानी सी चल रही है;
दरवाजे के पीछे;
आलमारियों को दीमक चख रहे हैं।

आज खड़ा है;
वो पुराना घर भी;
संजोये कई राज;
जो उसे बेहद तंग कर रहे हैं।