चीन का जल उपनिवेश - तिब्बत की नदियाँ

बांधो का सबसे बड़ा निर्माता चीन चीन की अर्थव्यवस्था Hydrolic है | ये चीन में फैले हुये हजारो बांधों पर निर्भर है | चीन में 2005 तक मध्यम एवं बड़े 85 हजार बांध थे | इसमें छोटे बांध शामिल नहीं है | 1949 की अक्टूबर क्रांति के समय चीन में केवल 46 बांध थे | पिछले 55 वर्षों में ( 2005 के एक तथ्यांक के अनुसार )चीन में 85 हजार बांध बनाये गये | इस तरह औसतन प्रतिदिन एक बड़े बांध का निर्माण हुआ | पूरे विश्व में 45 हजार मेगा डैम हैं | उनमे से 22 हजार मेगा डैम सिर्फ चीन में है। सन् 2005 के बाद से चीन में जोर–शोर से नये बांधों के बनाने का दौर शुरू हो गया | ये सब बांध तिब्बत से निकलने वाली एशिया की साझी नदियों पर ही बनाये जा रहे है | वह Brek nack Speed से बांधो का निर्माण कर रहा है | इन बांधो को 2015 तक पूरा करने की योजना रही| इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि भारत अपने उर्जा की 70 प्रतिशत आवश्यकता के लिये आयात पर निर्भर है | लेकिन भारत विश्व की commercial energy के केवल 3.8 प्रतिशत का उपभोग करता है | चीन भारत से 8 गुणा अधिक commercial energy का उपभोग करता है | चीन द्वारा तिब्बत की सभी नदियों पर असंख्य बांध बनाये जाने से एशिया के सभी देश जैसे:- भारत, बांग्लादेश, वियतनाम, कम्पुचिया, थाईलैंड, लॉस, वर्मा, म्यांमार, भूटान, नेपाल आदि प्रभावित होंगे | भारत की जनता, भारत की सरकार तथा एशिया के सभी देशों को मिलकर चीन द्वारा बांधों का अंधाधुंध निर्माण कर एशिया के देशों को बेपानी करने से रोका जाना अत्यंत आवश्यक है | इसके लिये विश्व जनमत तथा संयुक्त राष्ट्र से भी गुहार की जानी चाहिए |
अगर चीन को अविलम्ब नहीं रोका गया तो बाद में हमारे पास हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं रह जायेगा | चीन विश्व की दूसरी महाशक्ति के रूप में उभर रहा है | इसकी महत्वाकांक्षा अमेरिका को पीछे छोड़कर विश्व की प्रथम महाशक्ति बनने की है | अगर यह आर्थिक, राजनैतिक, तकनीकी में सबसे अग्रणी देश हो जायेगा तो किसी देश के लिये कुछ भी करना संभव नहीं रहेगा | भविष्य में जिस देश के पास परंपरागत उर्जा तथा अपरंपरागत स्रोत है , वही देश विश्व की अर्थनीति तथा राजनीति पर प्रभुत्व रखेगा | अभी भी दक्षिण पूर्व एशिया के सभी देश चीन के आतंक से ग्रस्त हैं | भारत को इन देशों का विश्वास तथा समर्थन अर्जित कर चीन की दादागिरि के खिलाफ एकजुट होकर कोई सकारात्मक उपाय ठूँठनी चाहिए | पानी में भी मीन प्यासी तिब्बत की नदियों का पानी एशिया के देशों में जाता है | तिब्बत पर चीन का कब्जा है | अब चीन मनमाने ढंग से इन नदियों के पानी का अपने लिये उपयोग कर एशिया के देशों को जल से वंचित कर रहा है | विडम्बना यह है कि तिब्बत की नदियों का पानी चीन में जा रहा है, पर तिब्बत के लोगों को पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं है | उनकी औरतों को अपने गाँव से दूर दूर से नदियों और झरने का पानी कमरतोड़ मेहनत कर पीने तथा व्यक्तिगत सफाई के लिये गाँव लाना पड़ता है | इसी तरह तिब्बत में तिब्बती ग्रामीणों को एक बिजली का बल्ब जलाने के लिये भी नहीं मिलती है | तिब्बत में सिर्फ चीन द्वारा बसाये गये चीनी कॉलोनी में बिजली एवं पानी की सुविधा उपलब्ध है | तिब्बत की नदियों का पानी जो चीन में जाता है वह भी वहाँ के किसानों को सिंचाई के लिये उपलब्ध नहीं है | सिंचाई के लिये ये लोग भूगर्भ जल का व्यवहार करते है जिससे भूगर्भ का स्तर नीचे चला जाता है | बीजिंग में भूगर्भ जल का स्तर आधा मिल नीचे चला गया है | तथा प्रतिवर्ष डेढ़ मीटर के हिसाब से नीचे जा रहा है | तिब्बत की नदियों के पानी से उत्पन्न बिजली चीन के बड़े-बड़े कारखानों तथा बड़े-बड़े शहरों को जाता है | चीन के ग्रामीण क्षेत्रों के लोग इनसे वंचित है | इस तरह चीन का अपना विकास भी Lop sided है | चीन का यूनान प्रान्त सालविन, मेकांग तथा यागत्से से बिजली पैदा कर विदेशों में बेचने की सोच रहा है | लेकिन इस क्रम में एशिया के देश जो तिब्बत की नदियों पर निर्भर है, वह तिब्बत की नदियों से मिलने वाली लाभ से जो अपनी विरासत है, से वंचित हो जायेंगे | विकास तथा सम्पति महानगरों तथा शहरों में केन्द्रित है | जहाँ चीनी रहते हैं | तिब्बती झेत्र में भी शहरी आबादी Non Tibeetan चीनी Immigrants की है | तिब्बत के देहाती क्षेत्र के वन उजाड़ दिए गये है | लैन (घास के मैदानों को)  Dedred कर दिया गया है | इससे तिब्बती लोग दरिद्र हो गये हैं | हाशिये पर चले गये हैं | (Impoverished and Marginalised) यह Sustainable नहीं है | वैज्ञानिकों का मत है कि दीर्घकाल में बड़े बांध किफायती एवं व्यावहारिक नहीं होते हैं | (Economical and Sustatainable) छोटे एवं मध्यम बांध श्रेयस्कर है | चीन के बड़े नेताओं का बड़े बांधों से मोहभंग नहीं हुआ है | क्योंकि चीन के बड़े नेताओं में काफी लोग शिक्षा से इंजिनियर हैं और उनमें अधिकांश Hydrolic Engineer है | पूर्व राष्ट्रपति हू जिन ताओ भी हाईड्रोलिक इंजिनियर थे | इसके अलावा आधी शताब्दी से अधिक समय तक बड़े बांध बनाने की प्रक्रिया में इंजिनियर, नौकरशाह, टेक्नोक्रेट्स, पार्टी लिडर, उनके रिश्तेदारों, बिल्डर्स, फाइनेनसियर्स, सरकारी बांध बनाने वाली संस्थाओं तथा विदेशी टेक्नोलॉजी देने वाली मल्टी नेशनल कंपनियों का गठजोड़ (Nexus) हो गया है | यह Nexus बड़े बांध बनाने की निति में परिवर्तन नहीं चाहता | इसमें उनका निहित स्वार्थ Vested Intrest) है | बड़े बांध बनाने में भ्रष्टाचार भी अधिक है | उपरी कमाई भी अधिक है | चीन का जो विकास हो रहा है वह Lop sided है | इससे चीन के गाँव में रहने वाले आम लोग लाभान्वित नहीं हो रहे हैं | विकास का लाभ चीन के शहरी निवासियों को बड़े-बड़े उधोगपतियों को बड़े-बड़े उधोगों को तथा समुद्र तटवर्ती क्षेत्र के निवासियों को हो रहा है | तिब्बत में जो विकास हो रहा है उसका कोई लाभ तिब्बतियों को नहीं हो रहा है | उससे लाभान्वित होने वाले चीन से लाकर बसाये गये चीनी हैं, Han Immigrints है | China is the biggest polluater चीन के आर्थिक विकास का पूरा Approach productivist / Consumerist है | इस उत्पादनवादी, उपभोक्तावादी, अर्थव्यस्था के कारण चीन विश्व का सबसे बड़ा प्रदूषक है | यह विश्व का कारखाना है | यह कोई भी चीज जो मनुष्य द्वारा सस्ते दर पर बन सकता है, बनाता है | इसके लिये यह संभव है क्योंकि चीन में कम्यूनिस्ट तथा सरकार का अधिनायक वाद है | इस अधिनायकवादी व्यस्था में श्रमिको को कम पारिश्रमिक मिलता है | वहाँ के श्रमिक कोई हड़ताल नहीं कर सकते और सरकार जितनी मजदूरी तय करती है उतनी पर काम करना पड़ता है | श्रमिकों को वहाँ कोई अधिकार नहीं है | कहने को चीन एक साम्यवादी देश है लेकिन यथार्थ में वहाँ की व्यस्था पूंजीवादी है | इसे चाहे सरकारी पूंजीवादी कह लें या पार्टी का पूंजीवाद कह लें | साम्यवादी सिद्वांत के अनुसार साम्यवादी व्यस्था में श्रमिकों का अधिनायकवादी (Dictator ship of the proletariat) होना चाहिए पर चीन की साम्यवादी व्यस्था में श्रमिकों के उपर अधिनायकवाद है | (Dictator ship over the proletariat) चीन में जब देंग सत्ता में आये तो उन्होंने बाजार सुधार वाली मार्केट रिफार्म की निति लागू की | इस नीति के तहत तेजी से आर्थिक विकास चीन का लक्ष्य बना | आर्थिक विकास sustainable है या नहीं उसका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसका ध्यान नहीं रखा गया | अंधाधुंध विकास तथा उपभोक्तावादी नीति के कारण चीन का योगदान | ग्लोबल वार्निंग प्रदूषण तथा जैव विभिन्न को कम करने में सबसे अधिक रहा है | इस Unsustainable growth का सबसे अधिक दुष्प्रभाव पानी के स्रोतो पर पड़ा है | फलतः चीन के 88 प्रतिशत नदियाँ इतनी बुरी तरह प्रदूषित है कि उसमें जीवन संभव नहीं है | (Biological dead) ये नदियाँ जो प्रदूषण का कुफल भोग दूसरा कारण चीन द्वारा जंगलों की अंधाधुंध कटाई है | तीसरा कारण है नदियों के Catchment area में खनन, पर्यावरण के बचाव का ख्याल किये बिना ही अंधाधुंध खनन | इन कारणों से भी नदियाँ प्रदूषित हो रही है | इन नदियों के नीचे के देशों ने चीन की इस विनाशकारी नीति का विरोध, पर्यावरण के सत्यानाश के खिलाफ आवाज उठाते रहते हैं, पर चीन इसे अनसुना करता रहता है | चूँकि भारत भी चीन द्वारा तिब्बत में पर्यावरण के सत्यानाश से प्रभावित है इसलिए भारत को इस विषय पर सशक्त रूप से मुखर होना पड़ेगा | चीन अब सुपर पवार हो रहा है | आर्थिक रूप से सामरिक रूप से तथा राजनैतिक रूप से वह बहुत शक्तिशाली हो गया है | वह एशिया के कमजोर देशों की परवाह नहीं करता | भारत के प्रति भी चीन का रवैया अमैत्रिपूर्ण और आक्रामक है | यह एशिया में भारत को अपना प्रतिद्वन्दी समझता है | दूसरे दर्जे का राष्ट्र समझता है तथा वह अभी भी middle Sydrome से पीड़ित है तथा अपने आपको एशिया का Over lord समझता है | ब्रह्मपुत्र का ग्रेट बेन्ड क्षेत्र तथा सिक्किम के उत्त्तर का Chumbi Vally क्षेत्र ‘हथियापीठ’ के दक्षिण है : South of the Highest Water Shed ब्रह्मपुत्र का ग्रेट बेन्ड क्षेत्र तथा सिक्किम के उत्त्तर का Chumbi Vally क्षेत्र ‘हथियापीठ’ (Highest Water Shed) के दक्षिण में है | सीमा निर्धारण के अंतर्राष्ट्रीय तथा भौगोलिक सिद्वांत के अनुसार (Highest Water Shed) से ही अंतर्राष्ट्रीय सीमा का निर्धारण होता है | इस सिद्वांत के अनुसार ब्रह्मपुत्र ग्रेट बेन्ड के क्षेत्र जहाँ अभी ब्रह्मपुत्र का Water diversion का काम हो रहा है उसे तथा Chumbi Vally को भारत में होना चाहिए था | ग्रेट बेन्ड एरिया में Lotekh, Pemako तथा Chindru का इलाका आता है | यह इलाका हथियापीठ के दक्षिण में है | यहाँ के मूल निवासी भारत के सियांग जिले के आदिवासी जाति के Tangam, Abor हैं | जिनको तिब्बती लोग Loba कहते हैं | उनके अनुसार लोबा का अर्थ होता है वे लोग जिनका अपना संस्थागत धर्म (Institutionlysed Religion) धर्म नहीं होता | जो गवार हैं, सुसंस्कृत नहीं है | जिनको तिब्बत के लोग लोबा कहते हैं। वे ऐसे लोग हैं जिनको यूरोप में क्रिस्चियन लोग Pagan कहते हैं | रोम के लोग Barbarian कहते थे तथा ग्रीस के लोग जिन्हें Savage कहते है | या जिन्हें Kipling ने Lesser being without the law कहा था | ग्रेट बेन्ड के निवासियों का भारतीय क्षेत्र से अधिक निकट तथा गहरा संबंध रहा | क्योंकि भारत तथा ग्रेट बेन्ड एरिया के बीच में जो पहाड़ी दर्रे हैं वो 4500 से 6000 फीट तक ऊँचे हैं तथा उनसे सालो भर आवागमन संभव है | इसके विपरीत ग्रेट बेन्ड एरिया तथा  तिब्बत के निकटवर्ती क्षेत्र Kongbo, Po, Zaul के बीच जो दर्रे हैं वे 14 हजार फीट से लेकर 16 हजार फीट तक ऊँचे हैं | साल में छः महीने ये दर्रे हिमपात के कारण बंद रहते हैं तथा उनसे आवागमन संभव नहीं | 19वीं सदी के आरंभ में भूटान के Monyl तथा Drugyl क्षेत्र के लोग एक भविष्यवाणी के तहत एक Promised Land खोजते हुये Gret Bend Area में आये तथा इस Promised Land में बस गये | उनलोगों ने भारत के लोबा लोगों से लीज पर जमीन ली तथा खरीदी | ग्रेट बेन्ड का एरिया तिब्बत नहीं है | यहाँ की भूगोल भाषा, रहन-सहन, खान-पान तिब्बतियों से भिन्न है | उनकी भाषा तथा भेष भूटान के लोगों से मिलता जुलता है | इसी तरह चुम्बी वैली का क्षेत्र भी पहले सिक्किम राज्य का क्षेत्र था | इसलिय बोर्डर पर पोस्ट खोलने की जरुरत नहीं थी | भारत की उत्त्तरी सीमा भारत-तिब्बत सीमा थी और सुरक्षित सीमा थी | 1950 में तिब्बत पर चीन के जबर्दस्ती कब्जे के बाद स्थिति में अमूल परिवर्तन आ गया | भारत-तिब्बत का स्वरूप बदल गया | भारत-तिब्बत सीमा भारत चीन सीमा हो गई | तिब्बत एक धर्मपरायण, शांतिपूर्ण देश था | जिसके भारत के साथ बहुत घनिष्ट संबंध थे | तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद हमारी सीमा पर एक विस्तारवादी, घोर राष्ट्रवादी, सैन्यवादी, आक्रामक देश बैठ गया | चीन के नेताओं का विश्वास था और अभी भी है कि सत्ता बंदूक की नोंक़ (Barrel) से निकलती है | (Power comes out of the Barrel of the Gun) भारत की उत्त्तरी सीमा जो इतिहास, भूगोल, परम्परा आदि से निर्धारित है, को चीन मानने को तैयार नहीं है | आज 67 साल बीतने के बाद भी उसने भारत के साथ सीमा विवाद तय नहीं किया है | तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद तथा चीन के इस आक्रामक रुख के कारण भारत सरकार ने तय किया कि हमारी उत्त्तरी सीमा क्षेत्र में शून्य (vacuum) है उसे यथाशीघ्र जहाँ तक संभव हो अपने पोस्ट खोलकर शून्य को पाटा जाये | इस निर्णय के बाद सीमावर्ती इलाके में भारत सरकार के पोस्ट खुलने शुरू हो गये | इस सिलसिले में सीमावर्ती दुर्गम क्षेत्रों में जिन अधिकारियों को भेजा गया उनके अग्रिम दस्ते में होने का सौभाग्य श्री J. N. Rai, rtd special secretary GoI को भी प्राप्त हुआ था | उनसे परस्पर बातचीत के आधार पर उन्हीं के शब्दों में ……” मैं भी अंधकार के उन पथिकों में था जो अनजान, दुर्गम, कठिन, साधनविहीन क्षेत्रों में गये | मैंने भारत-तिब्बत सीमा पर कोरबो नामक स्थान पर पहुँचा, जहाँ ब्रह्मपुत्र, जिसे तिब्बत में Tsangpo कहते हैं, का प्रवेश सियांग नदी के नाम से होता है, सियांग के नाम से ही प्रवेश स्थान से लेकर असम के फूटहिल्स में पासीघाट तक ब्रह्मपुत्र को सियांग के नाम से जाना जाता है तथा इस जिले को सियांग जिला कहते हैं | जब मैंने मैकमोहन लाइन पर चेकपोस्ट खोला तब कुछ दिनों के बाद ग्रेट बेन्ड एरिया के लोगों से मेरे पास एक दरख्वास्त आयी कि वे कोरबो के ‘साहेबरिम्पोछे’ से मिलना चाहते हैं | रिम्पोछे का शाब्दिक अर्थ होता है मूल्यवान (Precious) | तिब्बत में अवतारी मालाओ को आदरपूर्वक रिम्पोछे के नाम से सम्बोधित किया जाता है | चूँकि पेमाको के लोग मेरा नाम नहीं जानते थे तथा मैं कोरबो में पदस्थापित था इसलिये मुझे कोरबो के ‘साहेबरिम्पोछे’ के नाम से सम्बोधित करने लगे | मैंने उनके भेंट के निवेदन स्वीकार किया तथा मिलने के लिये सीमा पर आमंत्रित किया | ग्रेट बैन्ड एरिया के पेमाको, चिंडू तथा लोहतेखा का एक प्रतिनिधिमंडल मुझसे मिलने आया | इस प्रतिनिधिमंडल में गाँव के मुखिया थे | मठो के लामा थे, अवतारी लामा थे, हर तबके के लोग थे | इनका नेतृत्व पेमाको के सबसे वयोवृद्ध | व्यक्ति –मेमे’ केसांग कर रहे थे | मेमे का अर्थ होता है आदरणीय वयोवृद्ध | मेमे केसांग की उम्र लगभग 90 वर्ष की थी | इनलोगों ने निवेदन किया कि वे एक No Mains Land में रह रहे हैं | जहाँ न तो भारतीय प्रशासन है और न ही तिब्बती प्रशासन है तथा न ही चीनी प्रशासन है | उन्होंने निवेदन किया है कि चीनी बड़े अत्याचारी हैं | वे चीनी अत्याचारों का विवरण तिब्बत के खाम तथा आमदो प्रदेश के निवासियों से सुन चुके हैं क्योंकि वे शरणार्थी के रूप में भाग कर भारत में शरण के लिये आते रहे हैं | ग्रेट बेन्ड का एरिया पूर्वी तिब्बत (खाम) तथा उत्त्तरी पूर्वी तिब्बत (आमदो) से भारत आने के लिये निकटतम रास्ते पर है | मेमे केसांग ने मुझे बताया कि पेमोको चिंडू का एरिया भारत का क्षेत्र हैं जिसे उनलोगों ने भारतीय लोबा लोगों से खरीद कर अख्तियार किया था | बदले में जमीन के मूल मालिकों को तलवार, भूटानीशिल्क, जोजोमो (गाय एवं याक के क्रौस से पैदा दुधारू पशु) तथा मिथुन पशु देकर लिये थे | उन्होंने तिब्बती कागज पर तैयार किये गये हस्तलिखित लीज डीड/सेलडीड भी पेश किये | इन डीड पर जमीन बेचने वाले खरीदने वालों की हस्ताक्षर तथा मुहर भी थी | उन्होंने बार बार आग्रह किया कि चूंकि इस क्षेत्र के स्वामी भारतीय मूल के लोबा लोग थे तथा उनके भारत के साथ ज्यादा निकट संबंध रहे हैं, इसलिए इस क्षेत्र को भारत सरकार को अपने प्रशासन में ले लेना चाहिए | मैंने इस प्रतिनिधि मंडल का निवेदन मूल दतावेजों के साथ प्रोपर चैनल से भारत सरकार को भेज दिया | भारत सरकार से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी | बाद में 1962 के मध्य में चीन ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और भारत ने यह मौका खो दिया | इससे बड़ा जनमत संग्रह और क्या हो सकता था कि वहाँ के निवासियों का एक प्रतिनिधिमंडल जिसमें हर तबके के लोग थे | भारत सरकार से बार बार आग्रह कर रहे थे कि आप हमें अपने प्रशासन में ले लीजिए तथा हम आपको पोस्ट खोलने में सारी सुविधाएँ जैसे पथ बनाना, पुल बनाना, निवास के लिये झोपड़ी बनाना जैसी सुविधाएँ देंगे | आज यह बात इसलिए उल्लेखनीय है कि नामच्छाबारवा – ग्लालाफेरी ग्रेट बैंन्ड क्षेत्र में जो चीनी और अमेरिकी विशेषज्ञ की सर्वे टीम 1992 में पेमाको आयी थी उसको पेमाको के मोनपा लोगों ने ग्रेट बैंन्ड के दुर्गम गौर्ज में सर्वे करने में सहायता की थी | उनकी सहायता के बिना वे शायद इस दुर्गिम क्षेत्र में जा नहीं पाते | सरकार के द्वारा कोई रिस्पौंस नहीं आया तो बाद में मैंने पूछपाछ की तो पता चला कि सरकार की दुविधा के दो कारण थे | पहला कारण यह सही है कि वाटर शेड सिद्वांत के मुताबिक इस क्षेत्र को भारत में होना चाहिए था | पर यदि भारत सरकार यह कहती है कि मेकमोहन लाइन यहाँ दोषपूर्ण है तथा इसे वाटर शेड की तरफ खिसकाना चाहिए तो इससे चीनियों के उस तर्क को बल मिलेगा कि पूरी भारत-चीन सीमा ही दोषपूर्ण है तथा उसका नई बातचीत के द्वारा सुधार करना चाहिए | दूसरा कारण यह था कि यदि भारत सरकार इस क्षेत्र को अपने प्रशासन में ले लेती तो चीनी इसका बहुत कड़ा तथा शायद हिंसक विरोध करते तथा जो 1962 में हुआ वह शायद 1960 में ही हो जाता | चीन के इसी भय तथा आतंक के कारण भारत ने पेमाको क्षेत्र के लोगों के आह्नवान को अनसुना कर दिया | “ दूसरे डायवर्सन प्रोजेक्ट चीन ने ब्रह्मपुत्र के डायवर्सन के अलावा यांगत्से नदी के जल को भी डायवर्ट करने की योजना उत्त्तरी चीन में बनायी है | मूल योजना के अनुसार यांगत्से के पानी को इसके Head Waters में Chpture कर Yello river में ले जाने की योजना थी | इस डायवर्सन के तीन रास्ते हैं | पहला रास्ता पूर्वी रास्ता | इस रास्ते के द्वारा यांगत्से के पूर्वी हिस्से का पानी उत्त्तरी चीन में पहुँचाया जाना था यह स्कीम चीन ने पूरा कर लिया | दूसरा रास्ता मध्य रास्ता था यह रास्ता भी बन गया है | तीसरा रास्ता था पश्चिमी रास्ता | इस रास्ते के निर्माण का काम हाथ में नहीं लिया गया है क्योंकि इस रास्ता द्वारा यांगत्से के पानी को ब्रह्मपुत्र के पानी के साथ हुआन्गहो नदी द्वारा उत्त्तरी चीन में पहुँचाया जायेगा | इस योजना पर कार्य आरंभ हो चूका है | ज्ञात आकलन के मुताबिल इसे पूरा होने में 50 साल लगेंगे | लेकिन चीन की सरकारी कंपनी जिसने ल्हासा तक रेल लाइन चार वर्षो में निर्माण कर दिया है । उसे इन प्रोजेक्ट पर काम करने के बाद इस तरह की योजनाओं में काम करने का अच्छा खासा अनुभव प्राप्त हुआ है। यदि ब्रह्मपुत्र में डायवर्सन योजना रेलवे कॉन्ट्रकशन कोर्पोरेशन को दिया गया तो वे इस प्रोजेक्ट को आठ साल में पूरा कर देंगे | यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि चीन आत्म विश्वास से परिपूर्ण है तथा थ्री गौजेर्ज डैम से बड़े डैम बनाने के ठीक इसने विदेशों में भी लिये है ।इन वाटर ट्रांसफर्मर स्कीम के दुष्प्रभाव एशिया के देशों को जैसे: भारत, बांग्लादेश, वर्मा, थाईलैंड, कम्पुचिया, लौस पर तो पड़ेंगे ही पर यांगत्से बेसिन के चीनी प्रान्त जैसे – यूनान, सेचुआन, चुकिंग, सिंघाई आदि दुष्प्रभावित होंगे | इसलिये इस स्कीम का विरोध दक्षिणी चीन के लोग भी कर रहे हैं | ये योजना कार्यान्वित होने पर Yello River versus ; kaxRls river dwellers के बीच भी झगड़े होंगे | उत्त्तरी चीन Versus दक्षिणी चीन तथा चीन Versus एशिया के देशों के बीच झगड़े होंगे | तिब्बत का सामरिक महत्व: चीन द्वारा भारत की सीमा पर ब्रह्मपुत्र पर एक दीर्घकायबांध बनाकर ब्रह्मपुत्र के जल को उत्त्तरी चीन में ले जाना भारत के लिये गंभीर चिंता का विषय है | यह बांध भारत के पिछवाड़े में एक Aquatic Bomb होगा | इस प्रकरण में तिब्बत के सामरिक (Strategic) महत्त्व पर विचार करना समचीन होगा |

Tibetan Empire
(Free Tibbet) तिब्बत युरेसिया के मध्य में अवस्थित है | परम्परागत तिब्बत का क्षेत्रफल 2.56 मिलियन एक्सवायर किलोमीटर है | तिब्बत की लम्बाई पूरब से पश्चिम 25 सौ किलो मीटर है तथा उत्त्तर ऊँचे धरातल पर स्थित पठार है | इसकी औसत ऊँचाई समुद्र की सतह से 13 हजार फीट है | इसकी घाटियां 10 हजार फीट पर है | यहाँ घास के मैदान 14 हजार 18 हजार फीट पर हैं | तिब्बत पृथ्वी की सबसे ऊँची पर्वतमालाओं से घिरा है | यह भारत, चीन, पाकिस्तान, मायंमार, नेपाल तथा सिंक्यांग के बीच में स्थित है | इन देशों के केंद्र में ऊँचे पठार पर स्थित होने के कारण इसका बहुत सामरिक महत्व है | Spring Board or Military Operation इसके ऊँचे पठार सामरिक दृष्टी से एक बहुत ही उपयोगी Spring Board /  प्लेटफार्म का काम कर सकते हैं | वायुयान, रौकेट, मिसाइल आदि से आक्रमण करने के लिये | जिस देश का तिब्बत पर कब्जा रहेगा उसका प्रभुत्व पूरे दक्षिण एशिया तथा दक्षिण पूर्व एशिया पर रहेगा | वर्तमान में तिब्बत पर चीन का कब्जा है तथा चीन ने बहुत घातक हथियार जैसे मिसाइल, I.C.B.M. (Inter continental Ballistical Missile) जो आणविक वार हेड से लैस हैं, तैनात कर दिये हैं | इन आणविक रौकेट मिसाइल, रौकेट, के मार के जद में अमेरिका तथा रूस भी आ जाते हैं | तिब्बत के सामरिक महत्व को जारशाही रूस ने समझा, साम्राज्यवादी ब्रिटेन ने समझा | साम्राज्यवादी / रिपब्लिकन / कम्यूनिष्ट चीन ने भी समझा | इन सभी देशों ने तिब्बत पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश की | ब्रिटिश John Bull को चीनी Dragon से अधिक भय रुसी भालू (Rassion Bear) से था | इसलिए रुसी भालू को तिब्बत से बाहर रखने के लिये ब्रिटेन ने तिब्बत पर चीन की suzerainty की कहानी गढ़ी | लेकिन तिब्बत इसके बावजूद भी 1950 तक क़ानूनी तथा वास्तविक (De Jure and De Facto) रूप से स्वतंत्र रहा | तिब्बती Buffer तिब्बत एशिया के दो बड़े देशों भारत तथा चीन के बीच में एक ‘बफर’ का काम करता था | यह दो महान देशों के बीच में शांति-अहिंसा का क्षेत्र था | जिससे एशिया के इन दो विशाल देशों में बड़ी जनसंख्या वाली शक्तिशाली देशों में कभी संघर्ष नहीं हुआ | तिब्बत के कारण क्षेत्रीय शांति तथा स्थिरता रही | लेकिन जब तिब्बत पर चीन का कब्जा हो गया तो भारत और चीन के बीच में टकराव होने लगे | क्योंकि दोनों देशों के बीच एक साझी सीमा हो गई।इस टकराव ने 1962 में एक हिंसक युद्ध का रूप ले लिया | भारत की सुरक्षा के लिये , चीन और भारत के बीच टकराव से बचने के लिये , एशिया में शांति और स्थायित्व के लिये, तिब्बत का एक De Militaraised (विसैन्यकृत) De Nuclearised (आणविक अस्त्रों से रहित) अहिंसा का क्षेत्र बनाना अत्यंत आवश्यक हैं | परमपावन दलाईलामा जी ने ऐसा ही एक प्रस्ताव चीन की सरकार को भेजा | इस प्रस्ताव के अनुसार तिब्बत चीनी संविधान के अंतर्गत चीन का एक भाग बना रहेगा, परन्तु वहाँ कोई सेना तैनात नहीं होगी | वहाँ आणविक अस्त्र-शस्त्र तैनात नहीं होंगे | वह शांति तथा अहिंसा का क्षेत्र होगा | यदि चीन के नेतृत्व ने साहस और विवेक का परिचय देकर इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया होता तो इससे न केवल चीन तथा तिब्बत में शांति रहेगी, बल्कि पूरे एशिया तथा विश्व पर इसका अच्छा असर पड़ेगा | अभी भारत और चीन अपनी तिब्बती सीमा को रक्षा करने में जो अरबो रुपयों खर्च करते हैं, उस रूपये से विकास का न जाने कितना काम भारत तथा चीन में हो जायेगा | Tibbet