जम्बूद्वीप (एशिया) : चीन एक त्रासदी

जम्बूद्वीप जब तक चीन ने तिब्बत पर कब्जा नहीं किया था तब तक भारत और चीन के बीच में कोई तकरार नहीं था | उनके स्वार्थो में कोई संघर्ष नहीं था | इतिहास में पहली दफा भारत और चीन में 1962 में सैनिक संघर्ष हुआ | इसके पहले चीन और भारत सांस्कृतिक प्रभाव के लिये एशिया (जम्बूद्वीप) के देशों में एक दुसरे के प्रतिस्पर्धी अवश्य थे, पर उनमें स्वार्थो की कोई टकराहट नहीं थी। इसलिए कभी हिंसक टकराव नहीं हुआ | भारत के विद्वान चीन जाते रहे तथा चीन के विद्वान भारत आते रहे | एशिया के देशों में सांस्कृतिक प्रभाव के लिये चीन भी सक्रिय रहा और भारत भी सक्रिय रहा | भारत का सांस्कृतिक प्रभाव हजारों वर्षो तक उन देशों में रहा जिन्हें जम्बूद्वीप (एशिया) कहा जाता था |

जम्बूद्वीप(वर्तमान एशिया)


Jamboodweep (Asia) जम्बूद्वीप के देशों का वर्णन हमारे प्राचीन साहित्य में बौद्ध जातक कथाओं में है | ये देश जिनसे हमारे सांस्कृतिक, धार्मिक, व्यापारिक राजनैतिक संबंध रहे है | प्राचीन नाम चंपा (आज का वियतनाम), यवद्वीप (आज का यावा) , सुवर्गद्वीप (आज का सुमात्रा), अयोथिया (आज का अयोध्या, थाईलैंड), द्वारावती (आज का थाईलैंड), श्रीक्षेत्र तथा पगन (आज का वर्मा), Kambog (आज का कम्बोडिया), पारस ( आज का ईरान), खोटान ( आज का तुर्कमेनिस्तान,उज़्बेकिस्तान, कर्गेस्तान, कज़ख़स्तान आदि), मंगोलिया संपूर्ण दक्षिण पूर्व एशिया हजारो साल तक सांस्कृतिक तथा बृहतर भारत था | चाइनीज सूत्रों के अनुसार फुनाम (कम्पुचिया) कौडिन्य गोत्र के एक ब्राह्मण ने हिन्दू राज स्थापित किया | हिन्दुओं के प्राचीन साम्राज्य का जावा, सुमात्रा, कम्पुचिया, मलाया इंडोनेशिया, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, तिब्बत, म्यांमार, लौस, थाईलैंड, इंडोनेशिया, कम्पुचिया, वियतनाम, आदि जंबूद्वीप के देशों में प्रभाव रहा तथा भारतीय संस्कृतिक की स्पष्ट छाप आज भी इन देशों में देखी जा सकती है | इसी तरह चीन का सांस्कृतिक प्रभाव जापान, कोरिया आदि देशों में फैला | जम्बूद्वीप व बृहतर भारत में भारत का सांस्कृतिक प्रभाव प्राचीन काल से लेकर मध्य युग तक भारत का सांस्कृतिक प्रभाव मध्य एशिया, सुदूरपूर्व तथा दक्षिण पूर्व एशिया पर रहा है | ये देश भारत के सांस्कृतिक साम्राज्य के महत्वपूर्व क्षेत्र थे | इन देशों के साथ भारत के घनिष्ट सांस्कृतिक, धार्मिक, व्यापारिक तथा वैवाहिक संबंध भी थे | स्थल मार्ग से तथा जल मार्ग से भी | इन संबधों का जिक्र जातक कथाओं, बृहत कथा मंजरी, कथा सरित सागर, हरिभद्र सूरी जी की साम्रादित्य कथा में है | चीन के प्राचीन इतिहास तथा चीनी यात्रियों के वृतान्त में भी जम्बूद्वीप के कई देशों का भारत के साथ घनिष्ट संबंधों का जिक्र है | दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में भारत के बौद्ध, शैव, वैष्णो, धर्म प्रचार के लिये गये | सम्राट अशोक ने जब हिंसा का परित्याग कर धर्म, करुण, शांति द्वारा लोगों का हृदय जीतने की नीति अपनाई तब उनके गुरु आचार्य उपगुप्त (मोदगील पुत्र तिष्य) के नेतृत्व में बौद्धों की तृतीय महासभा ने विदेशों में धर्म प्रचारक भेजने का निश्चय किया | इस नीति के अंतर्गत धर्म प्रचारक तथा विद्वान उन देशों में गये | इन देशों के निवासी उस समय तक विकसित नहीं थे | इन धर्म प्रचारकों के अलावा भारत के साहसिक व्यापारी तथा नाविक भी इन देशों में गये | वहाँ अपने उपनिवेश बनाये | उन्होंने अनेक हिंदु राज्य स्थापित किये जैसे: श्रीविजय साम्राज्य, शैलेन्द्र साम्राज्य, मतराम साम्राज्य आदि | इन राज्यों की भाषा संस्कृत थी | राज-काज की भाषा, संस्कृति, शासन प्रणाली, जीवन पद्धति भारतीय थी | भारत के जिन प्रदेशों के लोग वहाँ जाकर बसे वहाँ के अपने नगरों के नाम से उन्होंने अपनी पुरानी मातृभूमि के नगरों, नदियों, जनपदों के नाम से नगर बसाये | हिन्दुओं ने वर्मा से लेकर सुदूर चीन तक हिन्द महासागर तथा प्रशान्त महासागर जो बहुत से छोटे-बड़े द्वीप व प्रायद्वीप हैं, वे सब मौर्यकाल से भारतीय बस्तियों से परिपूर्ण हो गये | दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में हिंदु उपनिवेशों की स्थापना की, यह प्रक्रिया सुंग-सातवाहन युग में आरंभ हुई थी और गुप्त साम्राज्य तक इसका चरम विकास हो गया था | 13वीं सदी तक इस क्षेत्र के ये भारतीय राज्य कायम रहे | इनके राजा भारतीय थे | उनमें बहुतों की उपाधि महाराजाधिराज की थी | कालान्तर में इस्लाम के आगमन के बाद इंडोनेशिया तथा मलेशिया की लोगों को धर्मातरण करके मुसलमान बना दिया गया | पर उनकी भाषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज, संस्कृति, आदि पर आज भी भारत की, हिंदु धर्म की गहरी छाप है | दक्षिण पूर्व एशिया तथा सुदूर पूर्व एशिया के जितने बौद्ध धर्मावलम्बी देश हैं, वे आज भी भारत को धर्म भूमि / आर्य भूमि मानते हैं तथा यहाँ तीर्थ के लिये आते हैं | 16वीं एवं 17वीं सदी में यूरोप के उपनिवेशवादी देशों जैसे:- स्पेन, हालैंड, पुर्तगाल, ब्रिटेन, फ्रांस आदि ने इन देशों पर कब्जा कर लिया | 1946 के बाद भारत स्वतंत्र हुआ तो भारत ने इन देशों को उपनिवेशवाद से मुक्त कराने में सहायता दी | 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रामण किया तो चीन के समर्थन में दक्षिण पूर्व एशिया के कोई भी देश नहीं बोले | मलेशिया के प्रधानमंत्री तुंकी अब्दुल रहमान दक्षिण पूर्व एशिया के अकेले नेता थे, जो भारत के समर्थन में खड़े हुये | इससे भारत के दिल में दक्षिण पूर्व एशिया के देशों से उदासीनता आ गई | लेकिन 1995 के बाद यह महसूस किया गया कि दक्षिण पूर्व एशिया के देशों की सुरक्षा तथा उनके आर्थिक विकास भारत के बिना संभव नहीं है | फलतः 1995 के बाद भारत की दक्षिण पूर्व एशिया सम्बन्धी नीतियों में बदलाव आना शुरू हो गया और अब एशियान के देशों के साथ भारत के संबंध प्रागाढ़ हो रहे हैं | सन 2000 में भारत तथा थाईलैंड, म्यांमार, लाओस, कम्पुचिया तथा वियतनाम ने मिलकर मेंकांग गंगा को-ऑपेरशन की स्थापना की | इस ग्रुप ने पर्यटन, संस्कृति, शिक्षा तथा यातायात के लिये योजनाएं शुरू कर दिया | सन 2006 में भारत मेकांग गंगा को-ऑपरेशन चेयरमैन भी रहा | दक्षिण पूर्व एशिया के देश अब भारत के निकट आना चाह रहे हैं | क्योंकि वे चीन की दादागिरि से आशंकित हैं | भारत भी इन देशों के साथ अपने सांस्कृति एवं व्यापारिक संबंधों को पुनर्जीवित करने मेंप्रयास रत है | इन देशों में जो खुदा खुदाइयाँ हुई है उनमें हिन्दू मंदिरों, मठों, बौद्ध विहारो, चैत्यो, स्तूपो के भग्नावेश बड़ी संख्या में आज भी विधमान है | संस्कृत, पाली तथा प्राकृतिक भाषाओं का इन देशों की भाषाओँ पर प्रभाव आज आज भी देखा जाता है | बालि में आज भी हिन्दू हैं | वहाँ के हिन्दू मंदिरों में हिन्दू विधान से पूजा होती है | जम्बूद्वीप के जो देश हैं वह जनसंख्या में तथा संसाधनों में चीन से बहुत कमजोर है | लेकिन ये सभी देश तथा भारत भी चीन की दादागिरी का कष्ट झेल रहे हैं | चीन तिब्बत पर कब्जा करके भारत सहित जम्बूद्वीप के छोटे देशों को उनके हिस्से के पानी से वंचित कर रहा है, पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है।जम्बूद्वीप के छोटे देश महाशक्तिशाली चीन की दादागिरी के खिलाफ आवाज नहीं उठा पा रहे हैं | भारत को इन सभी देशों को एकजुट कर एशिया की साझी नदियों के मसले पर एक प्लेटफार्म पर लाकर चीन का प्रतिरोध करना चाहिए | यदि सरकारी तौर पर यह करने में कुछ अड़चने हैं तो गैर सरकारी संगठनों को इस Common Cause के लिये जम्बूद्वीप के इन देशों से सम्पर्क साधकर चीन के इस रवैया यथा-पानी एवं पर्यावरण के मुद्दे पर संगठित होकर एक साझे मंच पर लाना चाहिए |

Jambbodweep (Asia) Map