जो वक़्त है, वही तो उम्र है

झाँकती है सफेदी बालों से 
छुपाने लगा हूँ उन्हें काली मेंहदी से।


धुँधलाने लगे हैं शब्द पढ़ने पे
चश्मा लग चुका है नजरों का ।

भूलता हूँ बहुत लोग कहते हैं 
अब टालता हूँ उलाहना औरों का ।

जब लकीरें पड़ती है माथे पर 
तब कुछ ज़्यादा ही मुस्करा देता हूँ ।

अल्हड़ चंचल मन जिसे 
समझाने लगा हूँ मैं…
जो वक़्त है, वही तो उम्र है

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