तिब्बत की स्वतंत्रता का अर्थ - तिब्बत का महत्व

सिंधु कैलाश मानसरोवर से निकलकर लदाख, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर होते हुये पाकिस्तान के पंजाब सिंध होकर अरब सागर में मिल जाता है | ब्रह्मपुत्र कैलाश मानसरोवर से पूर्व की ओर 1600 किलो मीटर पूर्व की तरफ तिब्बत की पूर्व की ओर बहता हुआ हठात भारत के अरुणाचल के सियांग जिले के सीमा के पास दक्षिण की ओर मुड़कर फिर दक्षिण-पश्चिम की ओर अरुणाचल प्रदेश तथा आसाम होते हुये धुब्री के पास बंगलादेश में प्रवेश कर जाता है | बंगला देश में प्रवेश के बाद इसका नाम यमुना हो जाता है | जहाँ बंगलादेश में ग्वालोंन्दो के पास इसका मेल गंगा की एक धारा पदमा से हो जाता है | यहाँ से पदमा के नाम से आगे बढ़ते हुए यह चांदपुर में मेघना से मिल जाता है तथा आगे मेघना के नाम से बंगाल की खाड़ी में समाहित हो जाता है | सतलज कैलाश मानसरोवर से तिब्बत होता हुआ हिमाचल तथा पंजाब में जाकर आगे सिंधू में मिल जाता हैं | कोशी, करनाली तिब्बत से नेपाल होते हुये भारत में आते हैं | मानस तिब्बत से भूटान होते हुये भारत में आता है | सालविन तथा इरावदी तिब्बत के खाम प्रदेश से होते हुये वर्मा तथा थाईलैंड में चली जाती है | यांग्त्से तिब्बत के आमदो प्रान्त से तिब्बत के खाम से म्यांमार थाईलैंड होते हुये चीन में चला जाता है | ये एशिया की दूसरी सबसे बड़ी नदी है | मेकांग तिब्बत के खाम प्रदेश से लॉस, कम्पूचिया, वर्मा, बियतनामा, थाईलैंड होते हुये चीन में चला जाता है | यह तिब्बत से निकलने वाली सबसे बड़ी अंतराष्ट्रीय नदी है | हुआन्गहों के आमदों प्रदेश के आमनेमाछेंन ग्लेशियर से होता है तथा ये उत्त्तरी चीन को सींचता हुआ पितसागर में मिल जाता है | ये सभी नदियाँ अंतराष्ट्रीय नदिया हैं तथा कई देशों को होकर बहती है | ये सभी नदियाँ एशिया के देशों की जिनसे होकर ये बहती है साझी विरासत है | अकेले चीन की बपौती नहीं, पर चीन मनमाने ठंग से इन नदियों के पानी को एक जबर्दस्ती लूट रहा है तथा प्रदूषित कर रहा है | जिसका कुफल एशिया के देशों को भुगतना पड़ रहा है | ये नदियाँ चीन द्वारा बूरी तरह प्रदूषित कर दी गई है | तिब्बत के क्षेत्र में जहाँ उदगम है वहाँ घने प्राचीन जंगल थे | 1950 में तिब्बत पर बलपूर्वक अधिकार करने के बाद चीन ने उन जंगलों की अंधाधुंध कटाई कर दी। जिससे इन नदियों में नीचे की देशों में बाढ़ तथा बालू आने तथा भूक्षरण की समस्या खड़ी हो गई है | ये नदियाँ एशिया के जिन देशों से बहती हैं वे बड़े उपजाऊ देश हैं। जो घनी आबादी वाले देश हैं जहाँ विश्व की 47 प्रतिशत आबादी निवास करती है | तिब्बत का भूगोल बड़ा अनूठा है | यह यूरेशिया के मध्य में अवस्थित है | ये विश्व का सबसे बड़ा और ऊँचा पठार है | इसकी एवरेज ऊँचाई समुद्र तल से 13 हजार फीट है | नदियों की घाटी 10 हजार फीट पर है | यहाँ के घास के मैदान 16 हजार फीट ऊँचाई पर है | यहाँ के पर्वतों की चोटियाँ 25 से 28 हजार ऊँची है | जो हमेशा हिमाच्छादित रहती है | अपने अनूठे भूगोल तथा यूरेशिया के केंद्र में दुनिया की छत पर अवस्थित होने के कारण इसका सामरिक तथा पर्यावरण की दृष्टी से यह बहुत महत्वपूर्ण है | तिब्बत पर जिस देश का कब्जा रहेगा वह पूरे साऊथ इस्ट तथा सेन्ट्रल एशिया को हावी हो सकता है | यहाँ के पर्यावरण में कोई छेड़छाड़ एशिया के सभी देशों को प्रभावित करती है | ठंड तथा ऊँचाई के कारण यहाँ का पर्यावरण बहुत नाजुक है | क्षति होने पर उसका भरपाई करना अब संभव नहीं है | तीसरा ध्रुव उत्त्तरी और दक्षिणी ध्रुव के बाद तिब्बत के पठार में हिमालय हिन्दूकुश पर्वतमालाओं के बीच विश्व का सबसे बड़ा हिम का भंडार है | इसलिए इसे, तिब्बत को तीसरा ध्रुव भी कहते हैं | तिब्बत में 46 हजार ग्लेशियर है | जो एक लाख पांच हजार वर्ग किलोमीटर में फैले हैं | इन ग्लेशियरों से पिघल कर आने वाले जल से तिब्बत से निकलने वाली एशिया की नदियों को जल प्राप्त होता रहता है | ये ग्लेशियर एशिया की नदियों को Perennial (सदानीरा) बनाती है | तिब्बत में मीठे पानी की 2000 झीलें भी हैं | जिनका कुल रकबा 35 हजार एक्सवायर किलोमीटर है | इसके अलावा तिब्बत में अनेक दलदलों (Wetland) से भी तिब्बत से निकलने वाली नदियों को जल प्राप्त होता है | विश्व में जल की कमी जल ही जीवन है |Water is lifes Matter and Matrix, जल के बिना जीवन संभव नहीं है | जल प्राणी मात्र के लिये आवश्यक है | बढ़ते हुये शहरीकरण के कारण Sanitation के भी बहुत जल की आवश्यकता होती है | पहले लोगों की सोच थी कि प्राकृति के संसाधन अपरिमित है | हम चाहे उनका उपयोग या दुरूपयोग करें वो समाप्त नहीं होने वाले हैं | लेकिन स्थिति ऐसी नहीं है | प्राकृतिक के संसाधनों को यदि विवेक के साथ उपयोग नहीं किया गया या उन्हें संजोकर नहीं रखा गया तो क्रमशः ये संसाधन दुर्लभ होते जायेंगे | धरती पर अधिकांश हिस्से में पानी है लेकिन यह समुदों का खारा पानी है | धरती पर जितने भी जल है उसमें मात्र 1.5 प्रतिशत ही सिर्फ पेयजल है (Frees Water) | इसलिए प्रकृति के संसाधन सीमित है | ग्लोबल वार्निग धरती का वायुमंडल Carbon – Dioxide जैसे Green House गैसों के कारण ऊष्ण हो रहा है | ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, सिकुड़ रहे हैं | नदियाँ तथा झीलें सूख रही है | वर्षा कम हो रही है | इनके कारण प्रकृति से जितना जल हमें मिलता था उतना अब नहीं मिल रहा है | जल की आवश्यकता और उपलब्धता के बीच एक खाई | इस खाई को पाटना जल प्रबंधन के बिना संभव नहीं है | आवश्यकता और उपलब्धता के बीच खाई ‘The 2030 Water Resources Group’ नामक संस्था के आकलन के मुताबिक जो सन 2009 में सर्वे की गई थी उसके अनुसार “Globally, the current withdrawals of about 4,500 cubci KMS exceed the availability of about 4.200 KMS which is expected to increase to 6.900 cubic Kms. With a slight drop in availability to 4.100 cubic Kms. Thus by 2030, a global deficit of 40% is forecast. For India the annual demand is expected to increase to 1,500 cubic Kms. Against a projected availability of 700.44 Cubic KMs. जलवायु में परिवर्तन के कारण पेयजल के स्रोत जैसे ध्रुवों के हिम, हिमाच्छादित पर्वत चोटियाँ पिघल रहे हैं | झील, तालाब सूख रहे हैं, नदियाँ तथा चौर सूख रहे हैं | U.N. intergovernmental panel of climate change ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के परिणाम स्वरुप हिमालय के ग्लेशियर जो एशिया की नदियों के पानी के मुख्य स्रोत है, कुछ दशकों में विहीन हो जायेंगे | इस भयावह भविष्यवाणी से एक विवाद खड़ा हो गया | कुछ शंकालु व्यक्तियों ने कहा कि जब तक ये भविष्यवाणी दूसरे अध्ययन से प्रमाणित न हो जाये तब तक इसे मानना नहीं चाहिए | लेकिन इन शंकालु व्यक्तियों ने भी यह स्वीकार किया कि हिमालय के जो ग्लेशियर है उनकी दशा ठीक नहीं है तथा यह गंभीर चिंता का विषय है | यहाँ तक कि चीन ने भी माना है कि तिब्बत के आमदो प्रान्त के आमनेमाछेंन के ग्लेशियर जहाँ हुआंगो तथा यांगत्से नदिया निकलती है वो टूटकर बिखर रही है तथा इन नदियों को अब कम पानी मिल रहा है | कुछ विशेषज्ञों का आकलन है कि वर्ष 2025 तक विश्व में दो तिहाई लोगों को जल का संकट भोगना पड़ेगा | ‘The World commission of water for the 21st century’ की चेतावनी है कि हम अभी इस वक्त World Water Gap का सामना कर रहे हैं और यह संकट बद से बदतर होगा | Water Gap के परिणाम स्वरुप खाद्यान्नों की कमी होगी | World Water Council (WWC) (1999) के अनुसार 21वीं सदी में युद्ध पानी के लिये लडे जायेंगे | WWC के अनुसार इस वक्त दुनियाँ के 29 देशों के 450 मिलियन लोग पानी की कमी से जूझ रही हैं | सन 2050 तक यह संख्या 2.5 विलियन हो जायेगी | भविष्यवाणी के मुताबिक 104 विलियन लोगों को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं होगा, 2.3 विलियन लोगों को व्यक्तिगत स्वच्छता के लिये पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं होगा | 7 मिलियन लोग प्रतिवर्ष पानी से संबंधित रोगों से मरते हैं | विश्व के 50 प्रतिशत नदियाँ तथा झीलें बूरी तरह प्रदूषित हैं | ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से हिमालय हिंदुकूश क्षेत्र के 80 प्रतिशत क्षेत्र बूरी तरह प्रभावित हैं | इसके दूरगामी परिणाम होंगे खाद्य सुरक्षा पर | इसके तत्काल परिणाम स्वरुप जो देश पनबिजली पर निर्भर हैं उनकी अर्थव्यवस्था पर इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा | ग्लेशियर का पिघलना भयावह स्थिति को जन्म देगा, जिसको रोकने के लिये तत्काल कदम उठाने की जरुरत है | भारत का जल संकट ‘2030 water perspective group के आकलन के अनुसार भारत को 2030 में भारत को लगभग 1500 Cubic Kms जल की आवश्यकता होगी जबकि उपलब्धता केवल 744 Cubic Kms की होगी | भारत का Annual Presipitation लगभग 1130 मिलीमीटर है और इसका भूमि क्षेत्र 3.28 मिलियन एक्सक्वायर किलो मीटर है | इस तरह Annual Precipitation के Volume का input 3840 Cubic Kms. इस तरह 744 Cubic Kms. की Projected उपलब्धता 19 प्रतिशत बनती है | मांग और पूर्ति के इस असंतुलन को पाटना कठिन होगा | इसलिये प्रश्न उठता है कि भारत का आर्थिक विकास कैसे होगा | जल संकट का मूल कारण ‘जल संकट का मूल कारण वर्तमान पीढ़ी की गैरजिम्मेदाराना हरकतें हैं | पहले प्रकृति के विनाश की कार्यवाहियाँ अज्ञान में होती थी | लेकिन आज विज्ञान के कारण वर्तमान पीढ़ी के पास अधिक जानकारी है। इसलिये नैतिकता का तकाजा है कि वर्तमान पीढ़ी इस बात की समीक्षा करें कि विरासत में हमें अपने पूर्वजों से क्या मिला और हम आने वाले पीढ़ी के लिये क्या छोड़कर जायेंगे | आज मानवीय मूल्यों के प्रति परिबद्धता से अभाव में पृथ्वी पर जीव-जगत का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है | उपेक्षा, लालच और समूचे जीव-जगत के प्रति आदर के अभाव प्राकृति और प्राकृतिक संसाधनों का विनाश हो रहा है | अनादर की यह भावना जाने-अनजाने मनुष्य की अगली पीढियों के प्रति भी है | क्योंकि यदि विश्व में शांति की स्थापना नहीं हुई और पर्यावरण का विनाश इसी तरह जारी रहा, तो अगली पीढ़ी को संसाधनों से विहीन धरती मिलेगी |’—- परमपावन दलाइलामा पर्यावरण के प्रति परम्परागत भारतीय मूल्य भारतीय मूल्यों के अनुसार अतिसय संचय तथा अतिसय संग्रह से बचना है | पप्रकृति से अपनी न्यूनतम आवश्यकता के अनुसार ही लेना है | भारत में निरा भोगवाद को कभी प्रतिष्ठा नहीं मिली | चार्वाक भोगवादी दर्शन ‘यावत जीवेत, सुखम जीवेत, ऋणम कृत्वा घृतं पीवेत, भस्मी भूतस्य, बेहस्य पुर्नागमन कुतहः’ | इस भोगवादी दर्शन को भारत ने नकार दिया | भारत में त्याग की परम्परा रही | बौद्ध धर्म के त्रिरत्न-सम्यकज्ञान, सम्यक दर्शन-सम्यक चरित्र तथा जैन धर्म के पंचब्रत – अहिंसा, सत्य, अअसत्य तथा अपरिग्रह को भारत की त्यागमयी परम्परा को शक्ति प्राप्त हुई | उपनिषदों ने तेन त्येक्तिन भुजिथा अर्थात् त्याग के साथ भोग करो, को प्रतिपादित किया | यह एक संतुलित दर्शन था | जिसमें भोग को विल्कुल नकारा भी नहीं गया लेकिन अतिवाद और अतिचार से बचने को भी कहा गया | हिन्दू धर्म के चार पुरुषार्थों में अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष में भी इसी संतुलित मूल्य को प्रतिपादित किया गया है | इसके विपरीत चीन तथा पाश्चत्य देशों का जीवन दर्शन भोगवादी है, उपभोक्तावादी है और प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग करने की है | उनका approach Productivist and consumerist है | जब तक Development Sustainable नहीं होगा तब तक पर्यावरण की सुरक्षा नहीं होगा | इस प्रकार हम दृढ़ता और निश्चितता के साथ कह सकते हैं कि “ स्वतंत्र तिब्बत ही मानवता का हरण, पर्यावरण का क्षरण और जलवायु परिवर्तन से निजात की गारंटी है।अर्थात तिब्बत की स्वतंत्रता - मानवता, पर्यावरण - “ जल! जलवायु!! जीवनमूल्य!!!” का बेहतर संरक्षण है।