दर्द

दर्द....
दर्द कब बँधे रहते हैं।
मौका मिले तो,
बिखर लेते हैं।
ये तो बस आँसूं ही है,
जो पलकों से सधे रहते हैं।
कोरों पर ही
लटके - लटके
काट देते हैं
पहाड़ सी उम्र ।
न सूखते हैं, न ढुलकते हैं,
सुखों की धुप की आस में,
बस यूँ ही टंगे रहते हैं।

मेरी हठीली सी वो मुस्कान 
रे आभा उसकी
गोधूलि से पहले ही
शाम होते ही
बस थोड़े से
बहुत थोड़े से
बच जाया करो मेरे लिए
ताकि मै देख सकू
सतरंगी सपने
दुनिया की कालिमा पर
छिड़कने के लिए
12ऑक्टोबर 2015

पीर पराई