दुखों में विसर्ग नहीं होते और न विस्मयादिबोधक .....

ये रंगीन चश्में , सेक्युलर, हठधर्मी ( शहरी बौद्धिक जड़-सूत्री), अतिवादियों का अविष्कार है
और  इनसे फूटती आँखें ,
हमारे समय का सच
चाहे बंगाल हो या केरल या बस्तर....
रामपुर, देवबंद, मुर्शिदाबाद हो या मालदा ....
कन्नूर, वड़नार, दंतेवाड़ा , बीजापुर या सुकुमा ...
हमारी आँखों का अस्तित्व
पल - पल उनके लिए खतरा है
इसलिए आए दिन
हमारी आँखों को
फोड़ दिए जाने कि कोशिश होती है
इसके पहले आपकी भी आँखें फोड़ दी जाएँ
बचिए इनसे,
क्योंकि दुखों में विसर्ग नहीं होते और ....
न विस्मयादिबोधक ...........


ये चश्में हमें दुनिया में सब कुछ सही होने का भ्रम कराते हैं
दिखाते हैं कि अभी भी हमारे पाँव के नीचे ज़मीन बाकी है
हमने तो संस्कृति को कवच बनाया था
नैतिकताओं को जीवन का आदर्श बनाया था
परम्पराओं और विग्रहों में नैतिकता का आदर्श देखा
लेकिन इन्हीं परम्पराओं और विग्रहों का अपक्षय होते देख सहज रहे
पलक झपकने के पहले हम कुछ और होते हैं
पलक झपकने के बाद कुछ और .....
पर परिवर्तन अनिमिष है
पर वास्तविकता यह कि दुःख अनिमिष नहीं होते
ये दुखों का दौर है और हम निमित्त  और ....
शून्य, कर्त्तव्यमूढ़ता हमारी संवेदनाओं का नियत्तांक
हमारी अंदर की रिक्तता
हमारी संस्कृत्ति, हमारी परम्पराओं से आवृत सत्य
और दुःख, त्रासदियाँ
इन्हीं रिक्तताओं की भरने की
एक सफल-दृढ़ चेष्टाओं का प्रतिफल
इसीलिए तो .......
दुखों में विसर्ग नहीं होते और ....
न विस्मयादिबोधक ...........


ताम्रपत्रों पर नहीं लिखा गया है
विवर्तनिक परिसीमन
सकरुण अवसान
जड़-सूत्रियों की परिष्कृत वंचनाएँ
सहस्त्राब्दियों का तिमिर, परतंत्रता
नैतिकताओं का क्षेत्रफल
संस्कृति की परिधि और ...
परम्पराओं का व्यास

प्रतिध्वनियों के हाहाकार में हम नहीं सुन पाए
नेपथ्य का कोलाहल
प्रयिकताओं का अपर्वतनांक
जो हमें भावशून्यता तक ले आया

और आज जब आँखें फोड़ना
बौद्धिक जड़-सूत्रता, हठधर्मिता, अतिवादिता प्रायोजित है
तब बेहतर यही है कि........
हम  अपनी नज़र से देखें,
 और बचें इन  नकली झूठे चश्मों से!
तभी तो ..........
हमारे दुखों में विसर्ग नहीं होते और ....
न विस्मयादिबोधक .....

टिप्पणी: हठधर्मी - शहरी बौद्धिक जड़-सूत्री (Urban Maoist)