नारी तू नारायणी हो....

लघु कथा 
शाम का अंधेरा घिर रहा था। पेड़ों पर चिड़ियों का कलरव सुनाई पड़ रहा था। पंछियों के साथ- साथ थके माँदे मेहनती लोग भी घर लौट रहे थे। सदा ईमानदार रहनेवाली बस्ती की बिजली  जो ईमानदारी की तरह कभी भी गायब होते रहती थी। इस समय भी गायब ही थी, गया ईमान कब लौटे •••• लौटे या ना भी लौटे••• कौन जाने।
राहुल भी घर लौटने वाले थके हारे  हुए लोगों में से एक था। उसके ‘विश्राम स्थल’ यानी ‘तथाकथित  घर’  से 2-3 सौ मीटर पहले उसे, उससे थोड़ा आगे लड़खड़ाते, बड़बड़ाते चलते हुए शख्स ने ध्यानाकर्षित किया, तभी उस शख़्स के हाथ में शराब की बोतल भी नजर आ गई। तो  काफी कुछ समझ आ गया ! ‘इस इलाक़े’ में घुस आये उस घुसपैठिये के ‘श्रीमुख’ से हवा को लक्षित और अनंत में  प्रक्षेपित ‘सुमधुर गालियों’ का प्रवाह भी निकलना शुरु हो गया।राहुल थोड़ी तेज कदमों से, मन ही मन उससे कई गुनी ‘मधुर’ गालियाँ मन ही मन उसे देता हुआ उसकी ओर बढ़ा••••
ऐसा करने वाला राहुल अकेला ही नहीं था••• आसपास के राहगीर, दुकानदार, रहवासियों में से भी  25-50 लोग उस तक पहुँचते-पहुँचते उसको चारों ओर से घेर कर पूछताछ शुरू कर चुके थे । इस इकट्ठी होती भीड़ में बड़ी संख्या में महिलाओं की भी उपस्थिति देख राहुल का मन और भी प्रफुल्लित हुआ कि कम से कम मेरे आसपास बसे स्त्री-पुरुष आज उम्मीद से भी बहुत ज्यादा जागरूक हो चुके हैं… इतने कि असभ्य,  कुसंस्कारित, गंवार,  बेबड़े, दहशतगर्द पहलवान सा दिखते इस इंसान के विरुद्ध सभ्य स्त्री-पुरुष एकजुट होकर विरोध करने तो निकले।
<strong>“काश! हमारे मोहल्ले की ही तरह सारे भारत में सभ्य नागरिक अमानवीयता के विरुद्ध एक-साथ एकजुट होकर खड़े हो सकें तो बड़ा से बड़ा लोफर-गुन्डा भी गुण्डई की जगह  मजदूरी में ज्यादा मजा देखने लग जाये।”</strong>
इन्हीं खयालों से उत्साहित और जन समर्थन से उत्तेजित राहुल उस दहशत गर्द की गर्दन पकड़ उसे नसीहत देने के इरादे से उसकी तरफ लपका तब तक भीड़ में शामिल 2-3 युवक और एक युवती (राहुल की ही उत्साहित पड़ौसन) उसे नीचे गिरा कर दबोच चुके थे।भीड़ में शामिल एक अधेड़ चिल्ला रहे थे-

“साले गंदी बस्ती के कीड़े••• हमारे यहाँ आकर दादागिरी दिखाते हो••• अब हम शरीफ जाग चुके हैं ••• एक मुट्ठी बन गये हैं••• अब तुम्हारी दादागिरी यहाँ नहीं चलने वाली!”
तभी उस शख्स को दबोचे हुए तीनों-चारों युवक-युवती उससे छिटककर खड़े हो गये और उसी अति उत्साहित  युवती ने रहस्योद्घाटन किया कि यह ‘गुण्डा नहीं गुण्डी है!’
भीड़ में शामिल किसी महिला की आवाज आई
 ‘गुण्डई क्यों कर रही है’
उसी उत्साहित युवती ने संभावना जतायी कि शायद इसके साथ कोई अन्याय हुआ होगा जिसका फ्रस्टेशन निकाल रही •••
या प्रतिवाद deprecation कर रही....
गुण्डे की जगह गुंडी का पता लगते ही लोगों का गुस्सा कौतुहल में बदल गया था। भीड़ में से किसी स्त्री  ने थोड़े अपनेपन से पूछताछ की तो पता लगा बीयर पीकर घर पहुँचने पर भाई ने उसकी पिटाई कर दी थी । भीड़ में खड़ी महिलाओं में से अधिकांश को उसकी उसके घर वालों द्वारा पिटाई, महिलाओं के विरुद्ध पुरुषों का अत्याचार लगने लगा था। तभी किसी की आवाज सुनाई दी
                         “महिला शक्ति जिंदाबाद!”
                           “शाबाश मेरी हीरोइन”
                       थोड़ी ही देर बाद दृश्य बदल चुका था ।
              महिलाओं ने उस (दहशतगर्द) महिला को  कंधों पर उठा रखा था ।
                            नारे लगाये जा रहे थे•••
                            “महिला शक्ति जिंदावाद!”
                           “महिला उत्पीड़न नहीं चलेगा!!”
                               “नारी तू नारायणी!”
                              “तू ही दुर्गा तू ही काली!”
                         “जो हमसे टकरायेगा चूर चूर हो जाएगा!”
                         “जो इससे टकरायेगा मिट्टी में मिल जायेगा!!”
भीड़ जुलूस में बदल चुकी थी। पुरुषों की जगह  अगुवाई महिलाओं के पास चली गई थी।महिला शक्ति को बहुत सारे जागरूक पुरुषों के कन्धों का भरपूर समर्थन भी मिला हुआ था ।
                    थोड़ी ही देर पहले राहुल कुछ ज्यादा ही खुश हो लिया था…
                                अब लग रहा था कि
                       “कितने जारज, वर्णशंकर, विधिनिषेध, दोगले  हैं हम”

नारी तू नारायणी हो