निजता की ओर लौट चलें

चलो मीत गाँव चलें,
फिर से उस ठाँव चलें
अपनों ने दाँव चले,
अब हम इक दाँव चलें
अब अपने पाँव चलें
पार अब नदी के हम,
खेकर निज नाँव चलें
छोड़ आये जिस निजता को
हम पगडंडियों की राह चलें
ताल तलैये नदी सोते की राह 
अब वे खेत खलिहान चलें 
ताजे मीठे गन्ने की आस में 
खेतों की मेढ़ों पे दौड़ चलें 
चहूँ दिश फैली महूँए की 
भीनी भीनी मधुर सुगन्ध
उषा प्राती में बग़ीचे की ओर चलें 
अपने ही ओर, अपने जवार में
लौट चलें 
22December 2014

खेतों में कटे धान की बोझ , खलिहानों में जाने के लिए तैयार