निज़ाम

टूटते रिश्ते, बनते बाज़ार 
इस बाज़ार में , खरीददार कौन है?
एक धीमी आवाज़ आई|
जो यह निज़ाम है,
व उसके अमलदार 
कुछ दूर मुल्ला नसरुद्दीन 
बबूल के दरख़्त के नीचे 
औधें मुंह पड़ा था 
कुछ यों ही फुसफुसा कर 
कह रहा था
उसका गदहा 
कटीले रेगनी की झाड 
को चर रहा था
25 December 2013


मुल्ला नसरुद्दीन