पंथ प्रथम

मज़हब तुम्हारी,आधी रचना
आधा जगना,आधा सपना
नहीं सूझता है कुछ मन को
कैसे रोकूँ आज समय को
सुख,व्याकुलता मिश्रित क्रम है
आशंकित हूँ,पंथ प्रथम है
रक्तिम नेत्रों को बना बज्र
मादित नयनों से कर प्रहार
भूखी आँखों से क्यो खींच रहे हो
आकर्षण-तरु सींच रहे हो
नहीं शक्ति आमन्त्रण तज दूँ
उद्वेलित हूँ नहीं सहज हूँ
साँसो का आवेग विषम
आशंकित हूँ पंथ प्रथम
15 September 2015

कबीरोत्सव