पुरुषार्थ आत्मज दर्द

जब जब आँखों में नीर भरा 
जब उदासी का साया छाया
जब आँसूँ पलकों से छलका
जब चंचल मन कुछ घबराया 

हमने कह के यों समझाया
मन आख़िर तू क्यों विह्वल
ये जो घिरा कूप अँधेरा है 
थोड़ा दर्द है सबका हिस्सा 
थोड़ी उदासी सबका हिस्सा 
नयनें तेरी बेकार सजल हैं 

बिन बादल सावन की वारिस 
हर पल एक नया मौसम है 
क्यों तू ऐसा पल खोता है 
मन आख़िर तू क्यों रोता है 
सामर्थ्य क्यों यों ही सोया है 
बड़वानल सी आग जलाओ 

उठ खड़ा हो दौड़ लगाओ 
पुरुषार्थ तुम्हारा मचल रहा है 
थोड़ा दुःख है मेरा हिस्सा 
थोड़ा दर्द भी मेरा हिस्सा 
जब जब उदासी का मेघा छाया 
20 October 2011