बिता मधुमास

छटपटाते वह रहेगी इस चढ़े मधुमास में।
स्मृति जगाने आयेगी रैन में सो पायेगी।।
फागुन की मद ,थपकियाँ देकर सुला पायेगी ?
चैत की उन्माद ,सन्ध्या से ही सतायेगी
जब  वातायनो से चाँद, झाकेगा उसकी छवि पे।
तो अंगड़ाइयां, उसके दर्द को सहलाएगी।।
छटपटाते वह रहेगी इस चढ़े मधुमास में
स्मृति जगाने आयेगी रैन में सो पायेगी||१||

सिहरन भरी ओ रात ,जब वसन्त की आयेगी
सुगंधों को बिखेर , उसके दर्प को झुठलायेगी।
छवि को देख दर्पण में , वह क्या  खिलखिलाओगी।
 यौवन की बेला गई ,श्रींगार क्या कर पायेगी।
छटपटाते वह रहेगी, इस चढ़े मधुमास में।
स्मृति जगाने आयेगी रैन में सो पायेगी||२||

जब खिलेगी हेमंत की चाँदनी ,
वो छटा उसे रुलायेगी।
पल पल जगाने आयेगी ,
 कुसुमों की गंधों  की बयारें |
जब मलय की मदमादी बयारें ,
उसके गात को सिहरायेगी।
तो प्रकृति के नियमो के ,
बन्धनों से मुक्त हो पायेगी ?
छटपटाते वह रहेगी इस चढ़े मधुमास में।
स्मृति जगाने आयेगी रैन में सो पायेगी||३||

प्रिय के मर्मो की हर चाह ,
प्रिय से क्या मिलाएगी?
दर्दो की आंसू हररोज ,
निशायें उसे पिलाएगी।
वेदना के स्वरों को न ,
कभी वह दबा पाएगी।
नयनों के दर्द को को ,
न वह  छिपा पाएगी।
भोर में कोई सहेली ,
जब उसे गुदगुदाने आयेगी।
 छटपटाते वह रहेगी इस चढ़े मधुमास में
स्मृति जगाने आयेगी रैन में सो पायेगी||4||
4 Agust 2011