ब्रह्मपुत्र - चीन का जल उपनिवेश

जांगमू बाँध , तिब्बत
ब्रह्मपुत्र के जल को बांधकर उत्तरी चीन में लाने की परिकल्पना: उत्तरी चीन के जल की समस्या के समाधान के लिये ब्रह्मपुत्र के पानी को जो चीनियों के मुताबिक यों ही बर्बाद हो रहा है, बेकार बहकर बंगाल की खाड़ी में जा रहा है, बांधकर उत्त्तरी चीन में लाने की परिकल्पना माओ ने 1950 ही में की थी । माओ ने तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद पेकिंग से ल्हासा तक रेल की लाईन बिछाने की भी परिकल्पना की थी | किन्तु उस समय माओ का यह सपना पूरा नहीं हो पाया | क्योंकि यह कार्य बहुत कठिन था, दुस्साहस का काम था | इन प्रोजेक्टों के लिये विज्ञान तथा तकनीक उतनी विकसित नहीं हुई थी | जब विज्ञान तथा तकनीक का विकास हुआ तो 2002 में चीन ने तिब्बत में रेल की लाईन बिछाने का काम शुरू किया तथा 2006 तक ल्हासा को पेकिंग से रेल मार्ग द्वारा जोड़ दिया गया | इस रेल प्रोजेक्ट को इंजीनियरिंग (Engineering Marvel एवं विज्ञानं (Technological feat) का चमत्कार माना जाता है | इस योजना के पूरे होने पर तथा यांग्तसे पर विश्व का सबसे बड़ा  पनबिजली डैम (Three Gorge Dam) बनाने के बाद चीन के आत्मविश्वास में और वृद्धि हुई तथा चीन ने  ब्रह्मपुत्रा के जल को उत्त्तरी चीन के तरफ डायवर्ट (Divert) करने की तैयारिया शुरू कर दी | सन् 2007 में चीन ने 100 विलियम युआन तिब्बत में 180 स्पेशल प्रोजेक्ट के लिये स्वीकृति दी | यह प्रोजेक्ट 2010 तक पूरे होने थे| इन योजनाओ को गुप्त रखा गया था | जब भारतीय उपग्रह बाँध के निर्माण से सम्बंधित चित्र मुहैया किए तो उसी समय से इस विषय को लेकर शंका ज़ाहिर की जा रही थी। चीन काफ़ी दिनों तक इस ख़बर सूचना का खंडन करता रहा । लेकिन कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन के पश्चात उसने भारत को बताया कि वह ब्रह्मपुत्र पर एक बाँध बना रहा है , साथ ही और चार बनाने की योजना है। 2014 इन्हीं योजनाओं की जांगमू, जिएशू, जियाचा सहित पाँच योजनाओं के पूर्ण होने की घोषणा भी कर दी। में पर एक अनुमान के अनुसार ये 180 योजनाएं ब्रह्मपुत्रा Water Diversion projects से सम्बंधित है | इस योजना का अंतिम गंतव्य स्थान Tianjin बंदरगाह है जो बीजिंग से आगे LOC के तट पर है | Shouman Tan | उत्त्तरी चीन की जल समस्या के समाधान के लिये मूल योजनाएँ थी यांगत्से के पानी को पश्चिमी मार्ग द्वारा हुआंगहों में ले जाने की तथा Yarlung Tsanpo (ब्रह्मपुत्रा) के पानी को ग्रेट बैंड से उत्त्तरी चीन की पानी की समस्या हल नहीं होगी | इसलिये एक नई स्कीम बनाई गयी | इस स्कीम के अंतर्गत तिब्बत के सभी प्रमुख नदियों यथाः ब्रह्मपुत्रा, यांगत्से, सालविन, मेकांग के पानी को Intercept / Capture/ Impond कर नहरो/ स्टोरेज डैम / पंप हाउसेस के द्वारा उत्तरी चीन में Yellow river के माध्यम से पहुँचाया जाये | Audicious / Grandious योजना का नया नाम दिया गया | यह नया नाम है Shoutain यह एक नया चायनीज शब्द है | उस Massiv system of Dams in Canal capturing all the major rivers oftivet for diversion Yello river | यह स्कीम का पहला बांध Tsethang के निकट Shoumatan में बनेगा | Shoumatan से Shou ले लिया गया तथा इस स्कीम की समाप्ति समुद्र में Yello river के मिलन के पहले Beging से आगे Tiangin बंदरगाह पर होगी | Tiangin से Tianले लिया गया तथा इस स्कीम का नया Shoumatian हो गया | इस योजना को South to North Water Diversion scheem तथा शाउटियांग ग्रेट वेस्टर्न रूट (शुरू होने तथा अंत होने के स्थानों को जोड़कर बनाया गया है) इस योजना को Peoples Liberation Army का सपोर्ट सन् 1988 से मिल रहा है | PLA का समर्थन आने के बाद कम्युनिष्ट पार्टी के शीर्ष नेताओं ने भी इस योजना में दिलचस्पी दिखाई | चीन के भूतपूर्व राष्ट्रपति जियांग जेमिन ने इस योजना को सिद्धान्त रूप से अपनी स्वीकृति सन् 1998 में दे दी | तत्पश्चात सन् 1999 में एक वैज्ञानिक सर्वे टीम ‘ग्रेट बेन्ड एरिया’ में सर्वे के लिये भेज दी गई | इस सर्वे टीम में अमेरिकन तथा चीनी विशेषज्ञ थे | इस टीम ने ग्रेट बेन्ड एरिया का सर्वेक्षण किया | उस समय इस सर्वे में उन्हें बहुत कठिनाइयों तथा जोखिम को उठाना पड़ा | इस काम में उन्हें उस झेत्र के मोनपा लोगों से बड़ी सहायता मिली | मोनपा लोग ग्रेट बैंड क्षेत्र के पेमाको एरिया के निवासी हैं तथा ग्रेट बेन्ड एरिया से सुपरिचित हैं | उनकी सहायता से ही सर्वे टीम सर्वे पूरा कर पाई | सर्वे में उन्होंने पाया कि ग्रेट बेंड एरिया की दूरी उत्तरी चीन के Yello River से निकटतम है | इसलिये यहाँ से ब्रह्मपुत्रा का पानी उत्त्तरी चीन में ले जाने में कम नहर खोदना पड़ेगा | इस ग्रेट बेन्ड एरिया में Sharp Descent के कारण यह स्थान पनबिजली के लिये अधिक उपर्युक्त है | पर इस स्थान पर सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि चारों ओर पाँच किलो मीटर ऊँचे पहाड़ हैं | (नामछाबरवा की ऊँची चोटियां) | सबसे कठिन तथा चुनौतीपूर्ण कार्य होगा पानी को पाँच किलो मीटर ऊँचे पर्वतों को पार कर पानी को आगे ले जाना | ग्रेट बेन्ड एरिया से उत्त्तरी चीन की दूरी सबसे कम होना तथा ग्रेट बैंड एरिया से उत्त्तरी चीन की दूरी सबसे कम होना तथा ग्रेट बैंड में ब्रह्मपुत्र के पानी का तीखा अवतरण (Steep Desent) | इस एरिया के चयन में महत्वपूर्व कारक (Crucial Factor) थे। इस समस्या का एक निदान यह सोचा गया कि ग्रेट बेन्ड से लगभग 100 किलो मीटर, पश्चिम Tsethang के पास जो गौर्ज है वहाँ बांध बनाया जाये | इस स्थान को Plus Point है कि इस जगह की ऊँचाई समुद्र की सतह से 3588 मीटर है तथा जहाँ पानी ले जाना है उस स्थान की ऊँचाई इस स्थान की ऊँचाई का अंतर सिर्फ 179 मीटर का है | इससे पानी को पम्पिंग द्वारा ऊँचा उठाने की समस्या रही होगी | पर यहाँ दूसरी समस्या थी | यहाँ से Yellow river की दूरी बढ़ जायेगी | दक्षिण से उत्त्तर पानी ले जाने के लिये जो नहरे खोदी जायेगी उसकी कुल लम्बाई 1239 किलो मीटर है | नहरों को रास्ते में 6 ऊँची पर्वत श्रेणियों को पार करना पड़ेगा | जहाँ पार करना संभव नहीं है वहाँ पहाड़ों के बीच सुरंग खोदे जायेंगे | सभी सुरंगों की कुल लम्बाई 56 किलो मीटर होगी | सुरंग खोदने के लिये Thermo Nuclear Blast का प्रयोग किया जायेगा | इससे Tectonic plate भी disturb हो सकते है भूकंप भी हो सकता है | लेकिन PLAPLA का विश्वास है था कि वे इस काम को बिना किसी दुर्घटना के अंजाम दे सकेंगे | जहाँ पानी को उपर चढ़ाना है वहाँ बड़े-बड़े पम्प हाउस बनाये जायेंगे | जो पानी को Up Lift) उपलिफ्ट करके आगे बढायेंगे | रास्ते में चार बड़ी महानदियों (यथा सालविन, मेकांग, यांगत्से की अपार जलराशि का प्रबंधन करना भी एक बड़ी समस्या होगी | रास्ते में पानी जमा करना और आगे बढ़ाने के लिये भी कई स्टोरेज डैम बनाने होंगे | यह बड़ा ही Complicated तथा Audacious Scheme है | आमदो प्रान्त का पूरा क्षेत्र एक विशाल पम्प हाउस में परिणत हो जायेगा | रास्ते में पानी को स्टोरेज करने के लिये स्टोरेज डैम बनाये जायेंगे | तिब्बत की सबसे झील कोकोनोर को भी इस जलराशि को रखने के लिये प्रयोग किया जायेगा | फलत: कोकोनोर झील का जल स्तर 100 किलो मीटर हो जायेगा | इससे अनेकों गाँव, चारागाह, शहर जलमग्न हो जायेंगे | इससे अनेकों गाँव, चारागाह, शहर जलमग्न हो जायेंगे | इस महती तथा दुस्साहसी कार्य को पूरा करने में अनेक कठिनाइयाँ, अनेक जोखिम है, लेकिन माओ के उत्तराधिकारियों ने इसे पूरा करने के लिये कृतसंकल्प है | माओ की शिक्षा के अनुरूप उनका विश्वास है कि अगर संकल्पदृढ है तो कोई भी ऐसी कठिनाई नहीं है जिसे दूर नहीं किया जा सके | There is long legacy in China of beliving that sheer will power camp over come all Physical obstacales. Mao was very fond of telling story of the foolise old man to remove mountain. इस दृढ़ निश्चय के संदर्भ में भारतीय प्रकरण से सबसे बड़ा उदाहरण भागीरथ जी का है | जो अपने दृढ़ निश्चय तथा धून से गंगाजी को स्वर्ग से पृथ्वी पर ले आये | इस सिलसिले में एक सामान्य व्यक्ति का हाल का उदाहरण है जो गया के माझी ने पहाड़ काट कर आमलोगों के लिये रास्ता बना दिया था | चीन में इस दुःसाहसी तथा जोखिम भरी योजना का विरोध वैज्ञानिक, पर्यावरणविद तथा सरकार के लोग भी कर रहे हैं | उनका कहना है कि योजना विपतजनक, अव्यवहारिक और अनावश्यक है | पर यह योजना हो के रहेगी, क्योंकि इस योजना को चीन के भूतपूर्व राष्ट्रपति झियांग जेमिन और राष्ट्रपति हूजिन ताओ तथा वर्तमान राष्ट्रपति शी ज़िनपिंग , PLA के 118 veteran जेनरलों, स्टेट काउन्सिल तथा नेशनल पीपल्स कांग्रेस, Chine peoples, Political consultative confreres का सशक्त समर्थन प्राप्त है | इसलिये जोरदार विरोध के बावजूद भी यह योजना कार्यान्वित होगी | इन शीर्ष नेताओं तथा PLA का चीन के नीती निर्धारण पर बहुत प्रभाव है | NRSA की हाल की रिपोर्ट के अनुसार इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो गया है | नामच्छा बरवा में विश्व का सबसे बड़ा बांध बन रहा है जिसमे 26 Turbine होंगे जो प्रति घंटा 40 मिलियन किलो वाट बिजली पैदा करेंगे | यह यांगत्से थ्री गौर्ज डैम से दुगुना होगा | यह बांध यांगत्से के दुगुना बड़ा होगा | इसी रिपोर्ट के अनुसार TSethang के पास भी ट्रंको की आवा-जाही शुरू हो गई है | निर्माण सामग्री वहाँ गिराया जा रहा है | इस संबंध में यह उल्लेखनीय है कि चीन की सरकार 2007 में 180 विलियम यूआन आवंटन किया था | तिब्बत में कुछ विशेष स्कीम के लिये जिन्हें 2010 तक कार्यान्वित करना था | इन स्कीम के विवरण प्रकाशित नहीं किये गये थे | पर अनुमान है कि ये स्कीम ग्रेट बेन्ड-ब्रह्मपुत्र वाटर डायवर्सन प्रोजेक्ट में अत्यधिक बिजली की आवश्यकता होगी | निर्माण, खुदाई, पम्प हाउसेज वैगरह के लिये | चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र के ‘जलहरण’ के असम पर होने वाले दुष्प्रभाव ब्रह्मपुत्र से जो अपार जलराशि हुआन्गहो में जायेगी उससे हुआन्गहों की जल की मात्रा चारगुनी बढ़ी जायेगी और इसी अनुपात में ब्रह्मपुत्रा का जो जल भारत में आता है वो कम हो जायेगा उसी अनुपात में | महानद ब्रह्मपुत्र जो आसाम में बरसात के दिनों में समुद्र की तरह ठाठे मारता है वह एक छोटी सी नदी का रूप ले लेगी | ब्रह्मपुत्र के जल के साथ जो उपजाऊ मिट्टी आसाम में आती है उसका आना भी बंद हो जायेगा | जिसके फलस्वरूप आसाम और बंगलादेश की भूमि की उर्वरा शक्ति घटेगी | अभी ब्रह्मपुत्रा में बड़े बड़े जहाज चलते हैं उनका आगमन संभव नहीं हो पायेगा | जल की उपलब्धता में कमी होने के कारण असम और बंगलादेश में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी | फलतः असम और बंगलादेश को दुर्भिक्ष का सामना करना पड़ेगा | अधिक पानी में होने वाली फसलों का उगाना संभव नहीं होगा जिसके कम पानी वाले फसल उगाना पड़ेगा (Cropping pattern) में बदलाव आयेगा | वन सम्पदा पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा | Flora and Fauna भी प्रभावित होंगे | आसाम की संस्कृति ब्रह्मपुत्र से बड़ा घनिष्ठ संबंध है | ब्रह्मपुत्र की जल में कमी आने से यहाँ संस्कृति पर भी प्रभाव पड़ेगा | ब्रह्मपुत्र असम की प्राणधारा है | उसकी आत्मा है | असम के अर्थव्यवस्था, उसकी संस्कृति, उसके दिन-प्रतिदिन का अस्तित्व ब्रह्मपुत्र पर निर्भर है | एक तरह से ब्रह्मपुत्र असमवासियों का जीवन सर्वस्व है | इसलिए व प्रेम, श्रद्वावश ब्रह्मपुत्र को प्यार से बोरा/बूढा लुईत कहा जाता है | ब्रह्मपुत्र के जल को उत्त्तरी चीन ले जाने से महानद ब्रह्मपुत्र का मरण हो जायेगा | भविष्य में यह एक महानद से क्षूद्र नदी में परिणत हो जायेगा | भोगोलिक एवं राजनैतिक (Geo-Political) दृष्टि से ब्रह्मपुत्र भारत की सबसे महत्वपूर्व नदी है | ब्रह्मपुत्र के चतुर्दिक कई विदेशी देश है उनमें से कई का भारत के प्रति मैत्री और सौहार्द का भाव नहीं रखते हैं | असम में कई पृथकतावादी तथा आतंकवादी संगठन भी सक्रिय हैं | जिनको कुछ विदेशी ताकतों से सहयोग मिलता रहता हैं | इस दृष्टि से भी ब्रह्मपुत्र का क्षेत्र अतिसंवेदनशील है | ब्रह्पुत्र के जलहरण के बाद वहाँ अन्न-जल की कमी होगी, राजनैतिक उथल-पुथल होंगे, पृथकतावाद को हवा दी जायेगी | इस संदर्भ में 1962 के चीनी आक्रमण के समय का पंडित नेहरु का रेडियो पर दिया गया भाषण ‘Our heart goes out to the people of Assam----------‘ को याद किया जाना चाहिए | ये भाषण तो पंडित नेहरु ने असम के लोगों के प्रति सहानुभूति प्रकट करने के लिये, उनके आँसू पोछने के लिये दिया था। पर इसका सीधा अर्थ था कि भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरु ने असम को उसके हाल पर छोड़ दिया | बहुत दिनों तक असम के लोगों के हृदय में यह बात हमेशा वेदना देती रही कि 62 चीनी आक्रमण के समय भारत के मुख्य भूमि ने उसके किसमत पर छोड़ दिया | इस संदर्भ में यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि अगर चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र का जलहरण भारत सरकार द्वारा गंभीरतापूर्वक रोका नहीं गया तो असम के लोगों में फिर वहीँ धारणा बनेगी कि हमें अपने हाल में छोड़ दिया गया है | (We have been deserted and abandoned to out faith) ब्रह्मपुत्र का Hydro power potential इतना है कि भारत की उर्जा की जरुरत की आवश्यकता का 41 प्रतिशत की पूर्ति इससे हो सकती है और भारत की उर्जा की समस्या का समाधान हो सकता है | लेकिन अब तक इसके 3 प्रतिशत संभावना का ही उपयोग किया गया है | इसलिए भी आवश्यक है कि ब्रह्मपुत्र का जलहरण रोका जाय | चीन यदि ब्रह्मपुत्र के जलहरण में सफल रहा तो चीन की उर्जा की समस्या का समाधान तो हो जायेगा, लेकिन असम सहित भारत की समस्याओं में इजाफा हो जायेगा | असम का अस्तित्व चीन के रहमो-करम पर मुनहसिर हो जायेगा |

जांगमू बाँध , तिब्बत भूकंप का खतरा ब्रह्मपुत्र पर चीन द्वारा ग्रेट बेन्ड क्षेत्र में बाँध है | यह क्षेत्र भारतीय सीमा से बिल्कुल सटा हुआ है | अरुणाचल के सियांग जिले के tuting subdivision से मिला हुआ है।हिमालय एक तरुण पर्वत है | Seismologicaly Active है | इस क्षेत्र में भूकंप के झटके आते रहते हैं | इतने बड़े विशाल बांध के टूटने का खतरा हमेशा बना रहेगा | यदि भूकंप हुआ तो असम, पूर्वी भारत तथा बंगलदेश में जल प्रलय की स्थिति हो जायेगी | भूकंप न भी हुआ तो इतनी अपार जलराशि के अपने दबाब से भी बांध टूट सकता है | वैसी स्थिति में भी प्राकृतिक भूकंप की तरह ही क्षति होगी | ताईवान और चीन के बीच में शत्रुता है | यदि कभी ताईवान और चीन के बीच युद्ध हुआ तो यह बांध भी ताईवान द्वारा बम का टारगेट बन सकता हैं | कोई आतंकवादी गुट भी इस बांध तक पहुँचने में कामयाब हो सकता है तथा भारत को बांध उड़ाने की धमकी देकर अपने शर्ते मनवाने में सफल हो सकता है | चीन के पास भारत को दबाने की लिये अनेक मुद्दे हैं (Leverage) ब्रह्मपुत्र का बांध उसको भारत पर दबाब डालने के लिये एक और (Leverage) देगा | इस बांध द्वारा अधिक या कम पानी खोलकर भी चीन भारत के लिये विपदजनक स्थिति ला सकता है तथा भारत को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है | यह बांध भारत के विरुद्ध भारत के पिछवाड़े में चीन द्वारा एक खतरनाक हथियार (Lethanl aqatice Weapon) का काम कर सकता है | यह एक खतरनाक जलास्त्र का काम कर सकता है |