भारत-तिब्बत सीमा का भारत-चीन सीमा होने का निहितार्थ

भारत तिब्बत सीमा का भारत चीन सीमा में परिवर्तन: इतिहास में भारत की चीन के साथ कभी कोई सीमा नहीं रही | भारत की उत्त्तरी सीमा तिब्बत के साथ थी | जिसके साथ भारत के हजारो वर्ष के घनिष्ट सांस्कृतिक, धार्मिक तथा व्यापारिक संबंध रहे | दोनों देश एक ही बोधिवृक्ष की दो शाखाएँ हैं | ये संबंध लगभग घनिष्ट रिश्तेदारी संबंध के जैसा है | तीर्थयात्रा और व्यापार के कारण भी भारत और तिब्बत में आमजन के स्तर पर संबंध था | फलतः भारत की उत्त्तरी सीमा एक शांत और सुरक्षित सीमा थी | पर तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद यह शांति सीमा एक जीवित, सक्रिय तथा विस्फोटक सीमा में परिवर्तित हो गई | क्योंकि चीन एक घोर राष्ट्रवादी, विस्तरवादी,आक्रमणकारी तथा सैन्यवादी देश है | इसके नेता चीन को Confucius के सिद्वांत के अनुसार अपने आपको बहुत श्रेष्ट समझते हैं | वे अपने देश को धरती से उपर Middle Kingdom मानते हैं | चीनी साम्राज्य को Heavenly/Celestial empire मानते हैं | चीन तिब्बत भारत की पारंपरिक सीमा को मानने से इंकार करता है | चीन ने High Watershed Principal के अनुसार नेपाल, भूटान, वर्मा के साथ अपना सीमा विवाद सुलझा लिया | पर वह High Watershed Principal के विरुद्ध भारत के अरुणाचल प्रदेश पर 35 हजार वर्ग मील क्षेत्र पर दावा कर रहा है | उसने Border Demarcation को Territorial dispute का रूप दे दिया है और बार बार अरुणाचल को दक्षिणी चीन कहता है | सहअस्तित्व के पंचशील सिद्वांत को 1954 में स्वीकार करने के बाद भी चीन ने 1962 में भारत पर हिंसक आक्रमण कर दिया | आज परिस्थितियाँ भारत के लिये अधिक जटिल और खतरनाक हैं | हू जिन ताओ एवं आज का शी जिंगपिन का चीन माओ के चीन से अत्यधिक शक्तिशाली है | 1983 के बाद चीन में बहुत परिवर्तन हुये हैं और आज यह विश्व की आर्थिक तथा सामरिक शक्तियों में अग्रणी हैं | प्रथम अक्टूबर 2009 को चीनी क्रांति के Commemoration day parade में चीन ने अपनी आर्थिक, सैनिक तथा Technological शक्ति का प्रदर्शन किया | हू जिन ताओ ने लगभग यह घोषणा कर दी कि चीन एक सुपर पावर हो गया है | यद्यपि हू ने एक सामंजस्यपूर्ण विश्व की भी बात की | चीन के ‘समांजस्यपूर्ण विश्व की सूक्ष्म व्याख्या’ की जाये तो इसका अर्थ होता है वह विश्व जहाँ चीन की दादागिरि मानने को सभी बाध्य हैं | 2015, 70th Anniversary of the end of World War कार्यक्रम के अवसर पर शी जिनपिंग की यह कहना कि “China would remain committed to the path of peaceful development”। इस peaceful development का सीधा अर्थ था डोकलाम का होना।यानी एक पड़ोसी कमज़ोर देश की संप्रभूता सर्वभौमिकता को सीधा नकार देना।आज OBOR प्रोजेक्ट से सम्बंधित बहुत सारे देश इसी आशंका से भयग्रस्त होकर उसमें अपनी सहज दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। भविष्य में जैसे जैसे चीन तथा भारत की अर्थ व्यवस्था विकसित होती जायेगी दोनों देशों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी | विश्व के संसाधनों के लिये बाजार के लिए, तथा विश्व में अपने प्रभाव के लिए दोनों देशों में टकराव होगा | चीन और भारत की अर्थव्यवस्था complementary नहीं है, competitive है | भारत की भू-सामरिक कमजोरी चीन भारत के सीमावर्ती देश तिब्बत में सैन्य दृष्टी से बहुत शक्तिशाली हो गया है | तिब्बत में चीन ने हवाई अड्डो , रेल लाइनों, रेल मार्गो और सड़कों का जाल बिछा दिया है | बहुत अल्पसमय में चीन भारतीय सीमा पर काफी सेना तैनात कर सकता है | तिब्बत में भारतीय सीमा तक और भी रेल लाइन बिछाने की योजना है | अभी वर्तमान में गोरमो-लासा, बरास्ता नागचुका रेल की लाइन है | इसके अलावा अभी चीन तिब्बत को तीन और रेलवे लाइनों से जोड़ रहा है | ये रेल लाइनें - ल्हासा – नागचुका – लेनछाउ  तीसरी रेल लाइन है, शिगात्से से – ल्हासा – Ngiti  – Chmdo – chengtu एक और रेल लाइन Ngiti-Dali भी निर्माणाधीन है | ये सब लाइने 2001 से 2038 तक पूरी हो जायेंगी | इनके अलावा एक लाइन गोरमो से लासा – बरास्ता – नागच्छु, दामसुन है | [caption id="attachment_446" align="alignnone" width="444"] Yunnan-Tibbet Train from Shangri la , Yunnan to Lhasa[/caption] इस संदर्भ में इन रेल लाइनों के बारे में दुनिया के अखबारों में, मीडिया में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। [caption id="attachment_447" align="alignnone" width="540"] Train to Guilin - Sanjiang - Zhaoxing - Guiyang[/caption] चीन ने अपने First five year plan -2001-2005  प्रथम पंचवर्षीय योजना में यह निर्णय लिया था कि रेल लाइन ल्हासा तक बना दिया जाये | इस निर्णय के पीछे निम्नलिखित उद्देश्य थे :- 1. कोरिया युद्ध के बाद जब चीन और रूस के संबंध बिगड़ने लगे तो चीन ने अपने सैनिक उद्योग (Military Industries) को अपने चीन के तटवर्तीय क्षेत्र से सुदूर मध्य चीन तथा उत्त्तर-पूर्व तिब्बत के आमदो प्रान्त में स्थानान्तरण का निर्णय लिया | साम्राज्यवादी अमेरिका (Imperialist America) (revisionist Soviets) के संभावित आक्रमण के खतरों से बचने के लिये | 2. तिब्बत को चीन का उपनिवेश बनाने की प्रक्रिया को पूरा करने के लिये तथा तिब्बत के प्राकृतिक संसाधनों – वन सम्पदा, खनिज द्रव्यों को तिब्बत से आसानी से चीन ले जाने के लिये | 3. चीन की घनी आबादी वाले प्रदेशों से हान जाति के लोगों को तिब्बत में बसाने के लिये | 4. तिब्बत में यदि आंतरिक विद्रोह हुआ या भारत का आक्रमण हुआ तो बहुत थोड़े समय इन चीनी फौज को तिब्बत तथा भारत की सीमा पर तैनात करने के लिये | मुख्य कारण थे चीन की रक्षा तथा सुरक्षा एवं तिब्बत के संसाधनों के दोहन | इन लाइनों के बनने से तिब्बत के पर्यावरण तथा तिब्बतीवासियों को बहुत हानी उठानी पड़ी है | रेलवे लाइन के environmentally hostil and geo-politically sensitive area में Xinjiang, Yunnan, Guangxi, Fujian, Inner Mongolia, Ningxia, Ganusu, Qinghai क्षेत्र में बनने से है | इस संदर्भ में People’s Daily,  18 March 2001 का निम्नलिखित उद्वरण द्रष्टव्य है :- “is just a few years to come, Wuhan will use electricity from Sichuan, Shanghai will burn natural gas from Xinjiang, people from the eastern regions will arrive at Lhasa or the “Sunshine city” by train, and people of north China will drink sweet water from the Yangtze River.” इसके अतिरिक्त चीन भारत को चारो तरफ से घेर रहा है | पाकिस्तान चीन का घनिष्ठ सहयोगी और मित्र बन गया है | पाकिस्तान को परमाणु बम बनाने में तथा मिसाइल का विकास करने में चीन ने काफी सहायता की | चीन ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर होकर बलूचिस्तान तक एक अत्याधुनिक सड़क का निर्माण कर लिया है | इस सड़क द्वारा चीन का प्रवेश अरब सागर में हो गया है | पाकिस्तान के बलूचिस्तान में चीन नौसैनिक अड्डा बना रहा है | इसी तरह चीन भारत के पड़ोसी देश म्यांमार में भी नौसैनिक अड्डा बना लिया है | जिससे उसका प्रवेश बंगाल की खाड़ी में हो गया है | चीन ने चीन से म्यांमार के समुद्रतट पर आधुनिक रोड का भी निर्माण कर लिया है | चीन अपना प्रभाव भारत की पड़ोसी देशों में नेपाल, श्रीलंका में अपना वर्चस्व बना रह है | बंगला देश में भी चीन अपना प्रभाव बढ़ा रहा है | इस तरह चीन चारो तरफ से भारत को पड़ोसी देशों के ही उलझा कर रखा जाये, जिससे भारत अपना प्रभाव एशिया में नहीं बढ़ा सके | सेना पर एशिया के सभी देशों से अधिक चीन ही खर्च करता है | अमेरिकी आकलन के अनुसार चीन का मिलिट्री बजट सन 2017 के लिये 152 विलियन अमेरिकी डॉलर है | जबकि चीन में रखा से सम्बंधित अन्य ख़र्च रक्षा बजट से अतिरिक्त होता है। इसप्रकार 2017 के आन्तरिक-बाह्य रक्षा बजट 350 - 400 विलियन अमेरिकी डालर है।अनुमान है की सन 2050 तक चीन का रक्षा व्यय अमेरिकी डॉलर 775 विलियन डॉलर हो जायेगा | चीन आज एक आर्थिक दैत्य है | 2020 तक यह Economic Power House हो जायेगा | इसका GDP amount 6.7% की दर से 8.9 Trillions USD(2015-16) से बढ़कर ये 16 Trillions USD (2020) हो जायेगा | 2020 तक चीन की अर्थ व्यवस्था अमेरिका के बाद दूसरे नम्बर पर होगी | 2020 तक अमेरिका के अलावा यह विश्व के सभी देशों को पीछे छोड़ जायेगा | चीन को दबाने के लिये भारत के पास में कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन चीन के पास भारत को दबाने के लिये बहुत सारे मुद्दे हैं | भारत को दबाने के लिये चीनी हथकंडे: भारत को दबाने के लिये चीन के पास कई मुद्दे हैं | एक मुद्दा है चीन का भारत के साथ सीमा विवाद | चीन ने सीमा की समस्या 14 देशों से सुलझा ली है लेकिन भारत के साथ सीमा विवाद वह 60 साल से लटकाये हुआ है | इस तरह भारत के हिंदमहासागर में अपना वर्चस्व बढ़ाकर वह भारत को दबा सकता है | भारत के पड़ोसी देशो में नौसैनिक अड्डे बनाकर भारत पर दबाव बना सकता है | भारत को दबाने के लिये एक और हथियार ब्रह्मपुत्र पर बनने वाला प्रस्तावित बांध है | इस पर भारत को त्वरित कार्यवाई करनी चाहिए | एशिया के जितने प्रभावित देश हैं उनको साथ लेकर चीन पर अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी द्वारा दबाव बनाकर चीन के इस दुष्प्रयास को रोका जाना चाहिए | भारत के पास चीन को दबाने के लिये एक भी मुद्दा नहीं है | एक तिब्बत का मुद्दा था जिसे हमने गवाँ दिया | 1950 तक तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र था | उसकी अपनी सेना, अपने कानून, अपना क्षेत्र, अपनी व्यवस्था, स्वत्रंत भारत के नई दिल्ली में एशियन रिलेसन्स कॉफ्रेंस हुई थी जिसमें एशिया के सभी देशों ने भाग लिया था – जैसे तिब्बत, नेपाल, भूटान, चीन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान | उस कॉफ्रेंस में तिब्बत ने एक स्वतंत्र देश के रूप में भाग लिया था | 1950 में चीन ने तिब्बत में बलपूर्वक कब्जा जमा लिया | 1914 में शिमला समझौते के तहत मैकमोहन रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा माना गया लेकिन 1954 में भारतीय प्रधानमंत्री नेहरु तिब्बत को एक समझौते के तहत चीन का हिस्सा मन लिए। इस कब्जे को भारत ने 1954 में पंचशील एग्रीमेंट के द्वारा वैध स्वीकृति दे दी – तिब्बत को चीन का स्वायत क्षेत्र मानकर भारत ने तिब्बत में अपने डाकघर, तार, गेस्ट हाउस, मिलिट्री Escort आदि Extra Territorial rights को त्याग दिया | भारत ने तिब्बत पर चीन के आधिपत्य को मान्यता दे दी | तिब्बत में भारत ने अपने विशेषाधिकार को त्याग दिया लेकिन इसके बदले में चीन ने भारत तिब्बत सीमा को मान्यता नहीं दी | चीन ने कहा कि नक़्शे पुराने हैं | अभी इनको जाँचने, परखने का मौका नहीं मिला है | उचित समय आने पर हम इस पर विचार करेंगे | जब तिब्बत में चीन ने अपने पैर जमा लिये तब उसने सोचा कि अब उचित समय आ गया है और चीन 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया | तिब्बत के ममाले पर भारत के पास चीन को दबाने की जो थोड़ी गुंजाइश थी उस गुंजाइश को हमने 2003 में पूरी तरह समाप्त कर दिया | 2003 में भारत के प्रधानमंत्री ने तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग मान लिया | पारंपरिक तिब्बत के तीन प्रान्त थे – Tsang आज का जत्द्ध TAR, दूसरा झींउ खाम पूर्वी तिब्बत, तीसरा आमदो पूर्वोत्तर तिब्बत | खाम और आमदो में तिब्बत की आधी से अधिक जनता निवास करती है | 2003 में भारत ने खाम और आमदो को जो तिब्बती प्रान्त है, वह चीनी प्रान्त मान लिया | सन 1950 तक जब तक चीन ने तिब्बत पर हिंसापूर्वक कब्जा नहीं कर लिया था। तिब्बत की नदियाँ अविरल बहती थी तथा एशिया के सभी देशों को आबाधित, अपरिमित स्वच्छ जल सुलभ था | तिब्बत पर जबरन कब्जे के बाद चीन ने इन नदियों को मनमानी तौर बांधना उनका दोहन करना, उनको प्रदूषित करना आरंभ कर दिया और उन पर अंधाधुंध अनगिनत बांध तथा पनबिजली योजनाएँ बना रहा है | विश्व में उर्जा के परम्परागत स्रोत – Fossil fuel की पूर्ति दिनानुदिन कम हो रही है और मांग बढ़ती जा रही है | इसलिये उर्जा के नये स्रोतों की खोज तेजी से हो रही है | चीन ने उर्जा का यह स्रोत तिब्बत के नदियों में पा लिया है | इस तरह चीन ने भविष्य के लिये अपने लिये प्रदूषणविहीन उर्जा की व्यवस्था कर ली | भारत उर्जा के लिये 70 प्रतिशत Imported Oil पर निर्भर है। अपनी सुरक्षा के लिये भी Imported अस्त्र-शस्त्र, सैनिक साजो-समान के लिये निर्भर है | तिब्बत की जंगलों की भी अंधाधुंध कटाई चीन ने कर दी | चीन की अपनी स्वीकारोक्ति के अनुसार चीन ने सन 1985 तक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तिब्बत के जंगलों की इमारती लकड़ी की विक्री से 54 अरब डॉलर की आमदनी की | सिंधु बेसिन में 90 प्रतिशत वनों का, त्सागंपों बेसिन में 73 प्रतिशत वनों, सालविन बेसिन में 72 प्रतिशत, मेकांग में 80 प्रतिशत, यांगत्से में 85 प्रतिशत, हुआंगहों बेसिन में 78 प्रतिशत वनों का सफाया कर दिया | तिब्बत का वनों का विनाश, पर्यावरण का सत्यानाश तथा नदियों को बांधकर मनमानी तौर पर चीन के उपयोग से एशिया के देश जल संकट, ग्लोबल वार्निग का संकट झेल रहे हैं | इसलिए इस समस्या का तब तक समाधान नहीं होगा जब तक तिब्बत को शांति, अहिंसा तथा पर्यावरण के अभ्यारण्य में परिवर्तित न कर दिया जाये | डॉ. राममनोहर लोहिया के कैलाश मानसरोवर तथा भारत की उत्त्तरी सीमा के विषय में विचार :- डॉ राममनोहर लोहिया एक मौलिक चिन्तक थे | अपने लोक संबोधनों में तथा अपने लेखों में यह मत प्रतिपादित किया कि कैलाश मानसरोवर तथा वहाँ से निकलने वाली नदियों तक का स्थान भारत की भूमि है | उनका कथन था कि यह मत भूगोल, इतिहास तथा हमारी पुरानी परम्पराओं से समर्थित थे | कैलाश मानसरोवर से भारत की तीन महान नदियाँ निकलती है | ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलज (शतदु) और कैलाश मानसरोवर से निकलने वाली हिम श्रृंखला नेन छेन टांगला रेंज तथा पूरब की ओर बहने वाला सांगपों भारत का मुख्य वाटर शेड है | इस नेन छेन टांगला रेंज से पूर्वगामी शांकों की सहायक नदियाँ शांको के बाये निकारे पर आकर उत्त्तर से मिलती है | उत्त्तर से आकर शांको में मिलने वाली सहायक नदियों में मुख्य है: Raga Tasng po, Kyi chu, Giamda chu and po Tsang po jion ब्रह्मपुत्र के बाये तरफ मिलती है | इससे यह स्पष्ट है कि कैलाश मानसरोवर रेंज उसकी नेन छेन टांगला रेंज की मेन वाटर शेड है और भारत की उत्त्तरी सीमा पूरब के बहने वाले सांगपो के 30 किलो मीटर उत्त्तर मेन छेन टांगला तक है | इस मत का समर्थन हमारे इतिहास पुरानों से भी होता है | विष्णु पुराण में भारत की सीमा इस श्लोक में बतायी गयी है – “उत्तरं यत्र समुद्रस्य, हिमादिश्चैव दक्षिणम | तदवर्ष भारतेनाम भारती यत्र संतति” अर्थात भारत वह भूभाग है जो वह देश है जो हिमाद्री (जो हिम से सदा ढका रहता है) के दक्षिण में तथा तीन ओर समुद्र है और जो विभिन्न प्रकार के लोग इस विशाल भूभाग में (जो हिमाद्री के दक्षिण में रहते हैं) वह भारत की संतान हैं | महाकवि कालीदास ने कुमारसंभव के प्रथम श्लोक में भारत के भूगोल का वर्णन करते हुये लिखा “अत्यउत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज” पूर्वापरौ तोयनिधि वगाहस्य स्थित पृथिव्या ईव मानदंड” | इसका अर्थ है – भारत के उत्त्तर में पर्वतराज हिमालय है जो दिशाओं का आत्मा है | जो पूर्व और पश्चिम के सागर के बीच में वैसे अवस्थित है जिसमें पृथ्वी का माप कर रहा हो | Himalaya is the king of mountains and soul of direction, seated between West and East seas as the measuring scale of the earth. | परम्परागत रूप से कैलाश मानसरोवर हिन्दू धर्म के अविच्छिन अंग है | कैलाश देवादिदेव महादेव तथा देवी पार्वती का निवास स्थान है | जो हिन्दुओं के सर्वप्रिय देवता हैं | डॉ. लोहिया के अनुसार हमारे शंकर भगवान तथा भगवती पार्वती ने भारत के बाहर जाकर निवास नहीं ही किया होगा | हम भारतीय जो उनके भक्त हैं अपने देवी-देवताओं को विदेश में निर्वासित नहीं किया होगा | इसलिए कैलाश मानसरोवर भारत का है हिन्दुओं का | हिंदु धर्म के अन्य मत जैन एवं बौद्ध भी कैलाश मानसरोवर से जुड़े हैं | भगवान ऋषभ देव दशावतार के पहले 24 अवतारों में पहले हैं।उन्होंने भी कैलाश मानसरोवर खण्ड में तपस्या की थी तथा यहीं कैवल्य प्राप्त किया था | भगवान ऋषभ देव का स्मरण ऋग्वेद – The most ancient literary monument in the world में आता है | तथा भगवत पुराण में भी आता है | हमारे ऋषि मुनी भी युग-युगों से कैलाश मानसरोवर खण्ड में तपस्या तथा ध्यान के लिये जाते रहे हैं | भारत और तिब्बत से हजारों की संख्या में प्रतिवर्ष यात्री कैलाश मानसरोवर में तीर्थ यात्रा के लिये जाते हैं | प्रति बारह वर्ष में कैलाश मानसरोवर में कुम्भ की तरह एक विराट मेला लगता है | जहाँ जब लोग कैलाश मानसरोवर की परिक्रमा करते हैं | हमारे ऋषि-मुनियों ने साधु-महात्माओं ने भारत की जो कल्पना की थी, वह स्पष्ट से एक देश एक राष्ट्र भी था और उसकी स्पष्ट सीमा थी | डॉ. लोहिया का कहना था कि कैलाश मानसरोवर तथा पूरब की ओर बहने वाले ब्रह्मपुत्र से 30 किलो मीटर उत्त्तर का क्षेत्र भारतीय भू-भाग था | इसे भारत ने तिब्बत को स्वेच्छा से दे दिया था क्योंकि वे भारत से सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से बहुत घनिष्ट रूप से जुड़े हमारे लिये जितने पवित्र थे, वैसे उनके लिये भी पूज्यनीय थे | इसलिये स्वामित्व के लिये विवाद नहीं हुआ था | लेकिन अब चुकी तिब्बत चीन के कब्जे में चला गया है जो तिब्बत भारत की साझी सांस्कृतिक परम्परा तथा पर्यावरण को नष्ट कर रहे हैं। इसलिये हमें यह क्षेत्र कैलाश मानसरोवर का क्षेत्र चीन से वापस ले लेना चाहिए | डॉ. लोहिया का यह भी मत था कि सामरिक दृष्टी से भी हमारी सीमा मैकमोहन लाइन तक नहीं बल्कि हिमालय की पूरब की ओर बहने वाले सांगपो के 30 किलो मीटर उत्त्तरी क्षेत्र तक होना चाहिए | हिमालय के दक्षिण में रहकर हिमालय सीमा की रक्षा करने में भारतीय सेनाओं को अनेक कठिनाईयां हैं | इसलिए हमारी ब्रह्मपुत्र के उत्त्तर में होनी चाहिए इससे भारतीय सेना को बहुत सामरिक दृष्टी से बहुत लाभ होगा | भारत तथा तिब्बत की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि जो सेना हिमालय की उत्त्तर में होगी उसको सैन्य दृष्टि से उसकी स्थिति लाभदायक होगी | लेकिन जो सेना हिमालय के दक्षिण में होगी उसकी स्थिति सैनिक दृष्टी से असुविधाजनक होगी |