माओ बनाम पं नेहरु

Nehru meets Mao in Beijing - 1954

आज लीडरशिप क्वालिटी वाली बात करते है। तो हम क्यों न कहें कि नेहरू से ज्यादा महान माओ थे। कम से कम माओ ने चीन का विस्तार तो किया, उसके भूसामरिक हितों की रक्षा तो की चाहे जो भी बलिदान देना पड़ा। तिब्बत पर कब्जा किया, शिनकियांग को कब्जे में लिया। हम कब चीन रहे? सत्ता हासिल करने के एक साल बाद ही माओ ने तिब्बत पर कब्जा किया, द्वितीय विश्व युद्ध की विजयी सेनाओं के खिलाफ जंग छेड़ी और कोरियाई युद्ध में अमेरिकी, ब्रिटिश व आस्ट्रेलियाई फौजों को यालू नदी के किनारे रोक दिया। अमेरिकी फौज को अपनी सीमा के पास नहीं पहुंचने दिया भले से दस-पंद्रह लाख सैनिक खेत रहे। यालू नदी आज चीन और उत्तर कोरिया की सीमा है।

अब इसकी तुलना नेहरू से कर लें। चीनी राजदूत ने जब नेहरू को बताया कि हमने तिब्बत को "आजाद " करा लिया है तो नेहरू ने पूछा किससे? अब ये "किससे" को पंडितजी की तीक्ष्ण बुद्धि का नमूना मानते हैं अपने नेहरूवादी। गर्व से बताते हैं कि नेहरू जी ने एक शब्द में कैसे निरुत्तर कर दिया। लेकिन तीक्ष्ण बुद्धि तिब्बत ले गई। फिर अक्साई चिन कैसे गया, एक तिहाई कश्मीर कैसे फिसल गया, संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता कैसे गई। सूची लंबी है। लोकतंत्र जो था, बाकी जो भी नुकसान हुआ, देश को सब कबूल करना पड़ा। आज के सामाजिक राजनीतिक विश्लेषक सेक्युलर राष्ट्रहित में या हुतात्मा के सम्मान में  इन चीजों को अनदेखा कर देते हैं। 

 दोनों देशों के नेतृत्व में मूलरूप से एक बात की समानता बड़ी ही ज़बरदस्त रही। वह यह  कि उनकी आस्था वंशवाद में रही। भूलकर भी  "टेक्नोक्रेसी- मेरिटोक्रेसी" में नहीं रही ? तभी तो वंशवाद के प्रति मोह जाग गया दिखता है तो उषाकाल परिणाम नेहरु श्रीमती इंदिरा गांधी को कांग्रेस का अखिल भारतीय अध्यक्ष घोषित करते हैं। आज वही शृंखला राहुल के अध्यक्षता तय होने तक सतत जारी है । भारत की तरह ही चीन में भी यह बीमारी व्यापक है। हम इससे अंजान हैं क्योंकि चीन के बारे में हमारी जानकारी खतरे की सीमा तक कम है। चीन में इन युवराजों को "प्रिंसलिंग" कहा जाता है यानी कम्युनिस्ट नेताओं के बेटे-बेटी। बड़े नेताओं के बेटे बड़े राजनीतिक ओहदे पाते हैं, उनसे छोटे सेना में और निचले वाले पुलिस में। इन प्रिंसिलंग्स की सेना में रॉकेट की  गति  से पदोन्नति होती है पर अमूमन वे बेजिंग और शंघाई में ही तैनात रहते हैं। सीमा पर कभी नहीं जाते। प्रिसलिंग्स की तरक्की देखिए। मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पिता शी झोंगशुन चीन के उपप्रधानमंत्री रहे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए बो शिलाई भी दौड़ में थे जिनके पिता बो याइबू थे। जैसे अपने ब्रह्मा विष्ण महेश हैं वैसे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में आठ अमर सेनानी हैं। बो याइबू उनमें से एक हैं। उप प्रधानमंत्री भी रहे। 

सांस्कृतिक क्रांति में नप गए पर देंग के राज में दिन फिर गए। अब बेटा बो शिलाई पांच साल से जेल में हैं। आगे भी रहेंगे। और फिलहाल जो शी जिनपिंग के उत्तराधिकारी माने जा रहे थे, उन्हें चार दिन पहले बर्खास्त कर दिया गया है। जेल में ही होंगे पर औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। उनके भी सालोंसाल तक सूर्योदय-सूर्यास्त देखने की संभावना नहीं है। इसी लीडरशिप क्वालिटी पर फिदा हैं भारतीय कांग्रेसी।

हमें यह भी जानकारी रखें चाहिये  कि कम्युनिस्टों के ये प्रिंसलिंग चीन के सबसे आभिजात्य स्कूलों व विश्वविद्यालयों से आते हैं । जो खास तौर से इन्हीं के लिए बने हैं। अपने यहाँ दून स्कूल भी बढ़िया है। पर कौन पढ़ सकता है वहां सिवाय राजनीतिक, व्यावसायिक व प्रशासनिक  आभिजात्यों के। 

चीन हाइरार्किकल यानी पदानुक्रमवादी समाज है जहां सब को बताया जाता है कि समाज में उनकी एक तय जगह है। उसी हद में रहें। चीनी समाज में गजब की एकरूपता है और 95 प्रतिशत हान हैं।
हमारे यहाँ भी ग़ज़ब की राजनीतिक एकरूपता है। क्यों कि हमारे यहाँ 95% राजनीतिक दल सेक्युलर हैं। शीर्ष राजनेताओं के वंशों को छोड़कर सभी छोटे बड़ें राजनेता को बताया जाता है कि राजनीति में उनकी एक तय जगह है। उसी हद में रहें।

परंतु एक भारी विषमता भी है। वह दोनों देशों के समाज में। जहाँ चीनी समाज थेन यांग चौक के दहशत में सालों साल मौन धारण किए रहता है वहीं भारतीय समाज आपातकाल की पीड़ा से फण तान कर सत्ता को ही पलट देता है