मीडिया, मोमबत्ती और हम

मीडिया, जो .....
लोकतन्त्र का
चौथा स्तम्भ है।
आज नज़र आती सबको
छिनाल के किरदार में।

आतंकवादी, माओवादी
सदा देश तोड़ने वालों की
महिमा मण्डन करती है
पी ओ के से म्यामार तक
सेना की साहस का 
खण्डन करती है।

आसिफा की मौत को
इंसानियत पर हमला कहती है
पर ठीक उसी क्षण
गीता के साथ हैवानियत को
घर का मसला कहती है।

मीडिया ही नहीं
हम मोमबत्ती लेकर
चलाने वाले भद्रलोक
लाजवंती की तरह
असहज संवेदना को
प्रकट करने वाले हमलोग
कहाँ बोलना है और
कहाँ पर बोल जाते हैं।

कटा एक सीन पिक्चर का
तो हम सारे बोल जाते हैं
कटा जब शीश सैनिक का
तो हम खामोश रह जाते हैं।

जिन ऊँची दुकानों में
कटती जेब सदा अपनी
मगर मजदूर माँगेगा
तो सिक्के बोल जाते हैं।

मोमबत्ती लेकर चलनेवाले हम भद्रलोक