मोक्ष

मैं
मुड़ जाना चाहता हूँ
सामने
बहुत बड़े पहाड़ हैं
घने जंगल हैं
रास्ते नहीं
घुटन भरे दलदल हैं ।

मैं पूरी कोशिश करता हूँ
साबित करने की
सामने की राह
नर्क समान है
क्यों कि मैं
मुड़ जाना चाहता हूँ।

मैं मुड़ नहीं पाता
क्यों कि दूजी ओर
आईना है ।

कोलाहल
अनंत पदचापों की ध्वनि
अंतहीन तृष्णाओं से भरे हृदय
अकुलाते हैं
हाथ उठाये
मांगते हैं
भिक्षा
तीव्र तेज़ से भस्म होने से बचने की।

किन्तु
जल रहे दीपक को
बुझाया है
आत्माहीन शव की फूंक ने ।

तब
अश्रुओं की बाढ़ में
जब डोलने लगे नौका
बुद्ध की मुस्कुराहट की।

सुनो यशोधरा…
तुम ,
पलकें मूंद लेना
तुम ,
थाम लेना अश्रु
तुम भींच लेना
हथेलियों में हृदय… और मुस्कुराना…।

तुम मुस्कराना…
कि तब ही पहुंचेगी पार…. मुस्कुराहट बुद्ध की….।