मौत की आग़ाज़

अजीब था उसका अलविदा कहना
सुना कुछ नहीं और कही भी कुछ नहीं
कुछ यूँ ही गम हुआ उसकी रू-ब-रू से
की लुटा कुछ नहीं और बचा भी कुछ नहीं ।१।
 
आज हमें क्या हो गया? 
भेद में अभेद खो गया। 
बँट गये शहीद, गीत कट गए, 
जब सरस्वती ही मंद पड़ गई। 
तब दूध में दरार पड़ गई।२।
जूझने का मेरा इरादा न था,
तब मौत से ठन गई! 
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई,
जब रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई|३।
 24 December 2013