यथार्थ का अंतर्मन

सिर पर मोरध्वज
अधरों पर मुरली
नंदलाल के मथुरा गमन पर
कान्हा की
एक हल्की सी मुस्कराहट पर
गोपियों के समूह से अलग
निमग्न हो खड़ी
राधा स्थिर चित हो
बोल पड़ी
” सुनो
जब तुम मुझे मुग्ध भाव से
देखते हो ना
मैं बिना श्रृंगार के ही
सुंदर हो जाती हूँ
मेरे जीवन में जितना
साथ है तुम्हारा है
बस
उतना ही हिस्सा जिया है मैंने

कि
जितनी तुम्हारे साथ चली
बस उतनी ही बही हूँ मैं
कि
जितनी बार तुम्हें देखा है
उतनी ही बार प्रेम किया है

तुमसे मैनें… ”

एक लम्बी उच्छ्वास के साथ
राधा मनन कर रही
” तुम्हारा मेरा सम्बंध
इतना सा ही है
तुम मौन रहो
मै सुनती रहूँ
तुम विरक्त रहो
मै जुड़ती रहूँ
तुम सत्य उधेड़ो
मै स्वप्न बुनूँ
विपरीत किंतु साथ ”

फिर तो
एक गहरी साँस भर
राधा फुट पड़ी
” हमारा रिश्ता
एक गहरी खाई पे
चरमराता हुआ
लटकता सा
एक पुल है
जिससे पार होना
नामुमकिन
खाई का भरना
असंभव
उम्मीद का दामन थामे
इसपार हम
उसपार तुम “
9 December 2017

राधा-कृष्ण