यात्रा

जो तेज़ हवा चली,
बारिश हुई, 
अब सब ख़ामोश–
एक चुप्पी पसरी है दूर तक
कोई कुत्ता नहीं भूँकता
कोई आवाज़ नहीं
दूर तक फैल गया
एक ऐसा सन्नाटा
जो कोलाहल पर भारी था
जिस से
खुले-फैले कुएँ में
मेरे नज़दीक वातावरण में भी फैल  गई है
पहाड़ों-पत्थरों की नि:स्तब्धता।

फिर भी 
एक दिन किया जाएगा हिसाब
जो कभी रखा नहीं गया

हिसाब
एक दिन सामने आयेगा।
जो बीच में ही चले गये
और अपनी बात नहीं कह सके
आयेंगे और
अपनी पूरी कहानी कहेंगे।
जो लुप्त हो गया अधूरा नक्शा
फिर खोजा जायेगा।