यारों की याद में

मैं यादों का
किस्सा खोलूँ तो
कुछ दोस्त बहुत ही
याद आते हैं
मैं गुज़रे पल को सोचूँ
तो, कुछ दोस्त
बहुत याद आते हैं
अब जाने कौन सी नगरी में
आबाद हैं जाकर मुदत से
मैं देर रात तक जागूँ तो
कुछ दोस्त
बहुत याद आते हैं
कुछ बातें थी फूलों जैसी
कुछ लहज़े खुशबू जैसे थे
मैं बागों के बीच टहलूं तो
कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं
जब गाँव गली से बाहर निकला
मैं तो पूरा ही बदला, पर
सबकी ज़िन्दगी बदल गयी
एक नये सिरे में ढल गयी
किसी को नौकरी से फुरसत नहीं
बहुर्तों को नए रिश्ते से फुरसत नहीं
किसी को दोस्तों की जरुरत नहीं
बहुतों को बीबी बच्चों से छुट्टी नहीं
सारे यार गुम हो गये हैं
"तू" से "तुम" और "आप" हो गये हैं
19 October 2015

बचपन की मस्ती