लाहौर की सिसकियाँ

एक शहर जिसके बारे में सिर्फ़ पढ़ा-सुना
जिसकी गलियों की सिर्फ़ तस्वीरें देखीं
फिर कैसा अजनबी सा रिश्ता है इस शहर से
आज सुना इक दोस्त जाएगा
फिर मुलाक़ात करेगा लाहौर की उन गलियों से
यूँ लगा जैसे वो शहर बुला रहा है
कहता है –
आओ तुम भी मिलो मुझ से
देखो अब कैसा लगता हूँ मैं
किसी और ज़िन्दगी में
मैं घर था तुम्हारा ।
पर मेरे शहीद-ए-आज़म के
नाम पर
मेरा एक चौक भी न होगा