लोकतंत्र का दारुण दुःख

'वह तोड़ती पत्थर' अनूठी
अमर काव्यकृति
कुछ यों ही कौंधी
काँटों से घिरी
गुमनामी में खोई जिन्दगी
एक अनाम-सी नार
जीवन भी ऐसा फटेहाल
निकल पड़ी काम की तलाश में
एक मासूम को
गोद में लिए, 
जिसे
न वर्त्तमान की खबर
न भविष्य की चिन्ता।

ले छेनी-हथौड़ा
अबला तोड़ती पत्थर
मिला काम उसे भी
जिसे पाकर
बनती है जिन्दगी।

हर ख्वाहिश है बेघर
हर चोट के साथ
पसीने से तर-बतर
उधड़े वस्त्र
दारिद्र इतना प्रबल कि
जेठ की दुपहरी, तपती सड़कें
भूख प्यास के साथ
आग उगलता सूरज
कहर बरपा रहा।

अबोध की कातर दृष्टि
बिलखता आर्त्तनाद का स्वर
सूखे चिपके वक्षस्थल
जो मिटा सके भूख बच्चे की
उसमें इतना दूध भी नहीं
पर सब कुछ सहना है
कुछ भी नहीं बोलना है
हर कामुक-हवसी नजर को
झेलना है।

पर निष्ठुर जिन्दगी से
कोई शिकायत नहीं
असीम पीड़ा को सहना
मगर बगावत नहीं
लुट चुका है हर सपना
राजनीति की चौखट पर
विकास के नारे के साथ
जो सुनने में कर्णप्रिय है
मगर अंदर से दारुण है।

अबला तोड़ती पत्थर

अरे, लोकतंत्र के
गलियारों के चौकीदारो !
सदियों से चली आ रही
इस लोकतंत्र की लूट में
हमें विकास, सुविधा नहीं
अब इस जिन्दगी को
एक आसरा चाहिये
सुविधाएं कम हों
पर आज एक 
सहारा चाहिये
इस तन्त्र के दारुण दुःख में
इस दुखियारी जिन्दगी की
बहती नदिया को
किनारा चाहिये।