विवर्त

मुझे सोने से पहले ,फिर एक बार उठ खड़ा होना है।
न हूँगा झंझावात, न उठ खड़ा हूँगा तूफ़ान बन के।
परिस्थितियों के विवर्त में ,बन पड़ूँगा रूद्र सा |
मुझे सोने से पहले ,फिर एक बार उठ खड़ा होना है ||१||

हार कर मै सोया हूँ,यह जानता है सब कोई |
पर थका -मादा बैठा हूँ,यह भी मुझे मंजूर नहीं |
अभी नहीं मेरी मुद्रा , गरुण पुराण की कथा सूनू |
लक्ष्मण जैसी मूर्छा हो ,या चिर निद्रा हो आने वाली |
करुणा का वन अति भयावह ,शान्ति की ठंडी सही न जाती |
बन विभत्स मै कूद पड़ूँगा , विपल्व की मझधार में |
मुझे सोने से पहले ,फिर एक बार उठ खड़ा होना ||२||

हर कीमत पर शान्ति चाहिए ,पर युद्ध के व्यापार से |
तभी रक्षित होगी करुणा , विश्व के व्यापार में |
दया धर्म तब पल्लवित होगा ,जगत को आर्य बनायेगे |
हर मानव में तब भाव जगेगा ,सर्वपंथ सदभाव में |
सजधज श्रृंगार खडी होगी , जीवन दर्शन के निर्माण में |
कुसुमित होगा नव जीवन दर्शन , संतति मधुमास मनायेगी
मुझे सोने से पहले ,फिर एक बार उठ खड़ा होना ||३||
3 September 2011

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