विस्मृति

शब्द
जो बिछड़े थे किसी मोड़ पे
पंख लगा कर उड़ गये
शब्द जो साथ चले थे मेरे
वो थक गये… ठहर गये
शब्दों का होना अखरता है अब
शब्द राह तो रहे
पर मंज़िल न हुये
शब्दों को
लड़ना पसंद है…
मरना पसंद है
पर साथ जीना पसंद नही
कितने भोले हैं ये मेरे
शब्द