व्यक्तित्व की उलझन

अनुगूँज
विविधा अरण्यानी के साथ;
सारे जागते जंगल ;
चुपचाप सोई नदियों की;
आँखों से बहते हैं।

दिन के ग्रामोफ़ोन पर;
रातों में बजती हैं;
सबसे उदास गज़लें ।

प्रेम के सारे प्रमेय;
अंततः कहते हैं ;
विरह , इति सिद्धम ।
यों
सबसे ज्यादा विरह गीत गाये हैं,
पेड़ों ने अपने पत्तों के लिए…।

रात के तीसरे पहर;
आसमानी समंदर की;
सारी नौकाएँ डूब जाती हैं ;
जबकि
तैरते रहते हैं ;
डूबने वालों के नाम ।

गोदना दूर हो चला।
पर
हाथों पर ;
पीठ पर;
चाँद के टैटू लदे है।

सीना ढका है,
सितारों की अनगिनत बेलों से।

भारी हो चुके हैं तलवे भी;
कि फटी बिवाईयाँ भरी है;
जाने कितने;
मरुस्थलों की मिट्टी से।

अब दिखाई भी नहीं देता;
कि आँखें;
अधजली उल्काओं के टुकड़े हो गई है।

मैं जड़वत हूँ;
मुझ तक के सफ़र सारे;
जो उसे तय करने है;
उस व्यक्तित्व को;
मिट्टी में दफ़ना कर आया हूँ।

चलो
मुझे समझा दो तुम,
अपने रिवाज़ों के ब्रह्मांड।
जब कभी हम मुड़ना नहीं चाहते…
मगर रास्ते ख़त्म हो जाते हैं….