श्याम के बाहिंनु में बसि के हू, कबीर की चादर हुइ गई राधा

इस पृथ्वी पर प्रेम के “प्रथम प्रयोक्ता” और विश्व को प्रेम से साक्षात्कार योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने कराया ।
प्रभु राम के सानिध्य में कुछ लोगों तक यह बात पहुंची ! वहां “प्रेमा-भक्ति” को स्थान मिला । कृष्ण के यहां “विशुद्ध प्रेम तत्त्व” को

“राधिका ने भोगा और जिया ढाई अक्षरों को ,
ग्रन्थ में गुना नहीं प्रबन्ध में पढ़ा नहीं ;
गोपियों का प्रेम नवनीत की कटोरियां हैं
रानियों के रास और विलास का घड़ा नहीं;
भोली भाली राधिका का सरल और सुबोध मन
श्याम से जुड़ा किसी चरित्र से जुड़ा नहीं ;
रुक्मिणी जी मानें या न मानें किन्तु राधिका के
प्रेम की प्रतीति से सतीत्व भी बड़ा नहीं ।

प्रेम की बानी गुनी जब तें —
काहू ज्ञानी गुमानी को जानति नाहीं
श्याम – कथा की व्यथा उर में
काहू और कहानी को जानति नाहीं
माखन चोर को जानति है —
सो सुदामा के दानी को जानति नाहीं
नेह गली की लली रधिया
रजधानी की रानी को जानति नाहीं

श्याम के प्रेम पयोनिधि डूबि के
नेह की गागर हुइ गई राधा
मोहन की मनमोहिनी दीठि पे
रीझि निछावर हुइ गई राधा
श्याम के बाहिंनु में बसि के हू
कबीर की चादर हुइ गई राधा
रुक्मिणी को रनिवास मिल्यो
इतिहास के आखर हुइ गई राधा ।”

—-आत्म प्रकाश शुक्ल ( राधा और रुक्मिणी )