सन्नाटों का शोर

जब कभी उस ठौर के
सामने से गुजरता हूँ
सन्नाटों की चीखों का
शोर बहुत पाता हूँ।
दम तोड़ती कुछ साँसों
को महसूस कर पाता हूँ
दुआओं से भरे सामान
का बोझ न सह पाता हूँ
दर्द से बोझिल आँखों से
नजरें न मिला पाता हूँ
उजड़े दरवाजे टूटी दीवारों के सिवा
कुछ नहीं पाता हूँ
यदि पूछता हूँ पता 
तो भटक जाता हूँ।