सर्दियों की रात

सुबह या शाम
रेत के सिंदूरी टीले पे
उतरने लगीं कोमल बूँदें
पर्वतों के पार
उभरी उजली सी मुस्कान
दूर कहीं पानी मे लिया विश्राम 
थक के सूरज के अश्व ने
मुंडेर लौटते
पंखेरुओं की हर्षित ध्वनि
खींच लाई
धुएँ की लकीर गगन में
चूल्हे पे उबलते भात ने
खुदबुदा के कहा
सर्दियों की संध्या में
ये तपिश सुहावनी है
ठंडी होती बोरसी की आग
खोरने पर बोल पड़ी
पूष की रात में
मेरी जलन भी
जीवन दायिनी है