स्मृति शेष

शहतूत की चाह

लौटते समय
मन चुप सा हो जाता है
और खुद
बहुत ही अन्मयस्क सा
वापस जाता हूँ

लगता है मानो
वे बिछुड़े दिन
अपने भीतर बैठा बालक
बालक का चहकना
स्मृतियों में दौड़ाता बचपन

पोखर, अमराईयाँ, टिकोले, दोस्त
चने का होरहा
केराव की छिम्मियाँ
कोल्हुआड़ी के ऊँख का रस
कराह में ताजा उतरा
गुड़ की सोन्ही सुगन्ध
इनसे मुँह मोड़ के जाता हूँ

शिशिर में वे
लम्बे गाढ़े-काले शहतूत
ग्रीष्म के वे काले-काले जामुन
जो ओंठों अँगुलियों को भी
लाल कर देते

इनके साथ
ठहाके की ठंडई
गलियाँ और गालियाँ
कितना कुछ है जो
अभी तक मुझे बुनी हैं
सारी बुनाई
झकझोड़ के जाता हूँ
12 April 2018

सरल तुरहा का बेर