हमारी एकता का संकट

आज बार-बार यह अवाज उठाया जाता है कि पिछड़ा – वंचित वर्ग की समस्या एक सामाजिक समस्या है और इसका समाधान राजनीतिक नहीं है। पर इतना भी सत्य है कि जब तक पिछड़ा वंचित वर्गों के हाथों में राजनीतिक सत्ता नहीं आती, उनकी समस्या का समाधान नहीं हो साकता है।

तुर्कों, मुग़लों और अंग्रेज़ों के हाथ से निकलकर राजनीतिक सत्ता ऐसे लोगों के हाथ में गयी, जिनका हमारे सामाजिक जीवन में आर्थिक, सामाजिक एवं  भद्रलोक ( सभ्य) होने का प्रभुत्व रहा। इसप्रकार के स्वराज्य का स्वरूप उन्हीं भुतकाल के विगत अत्याचार और अन्याय की याद दिलाएगा। अतः यह आवश्यक  है कि इन्हें भी सभी के साथ साथ राजनीतिक सत्ता में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले। इसका यह क़तई अर्थ नहीं कि इनका नेतृत्व पूर्वाग्रह से ग्रसित व दूषित बना रहे।

डा लोहिया की सामाजिक न्याय की यह गूँज, जिसकी प्रतिध्वनि उनके जीवनकाल में ही सुनायी पड़ने लगी थी। वह 70 के दशक के बाद भारत के राजनीतिक – सामाजिक परिवर्तन के रूप में उभर कर सामने आया।

पर इसका अर्थ यह नहीं कि हम योग्यता, प्रवीणता, ज्ञान-विज्ञान, रोज़गार एवं उद्योग तथा संस्थागत विकास में आरक्षण की बात करें। योग्य, कुशल, प्रवीण एवं ज्ञानी को पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। हम ज्ञान – विज्ञान और रोज़गार के क्षेत्र में योग्य बनने का सभी को अवसर प्रदान करें। शिक्षा एवं स्वास्थ्य सभी को निःशुल्क प्राप्त होना चाहिए। इसका पर्याय आरक्षण व सामाजिक स्थिति नहीं हो सकता है। योग्यता व प्रवीणता का  रोज़गार, ज्ञान – विज्ञान के क्षेत्र में वंचित होना एक सामाजिक राष्ट्रीय महापाप की कृति होगी, बल्कि इससे निकली प्रतिक्रिया की प्रतिध्वनि समाज में कटुता और वैमनस्य को जन्म देगा।

इसप्रकार बिखराव और अपनी ही कुंठाओं में घुटता समाज राष्ट्रीय एकता के लिए महाघातक सिद्ध होगा। जो आगे चलकर समाज राष्ट्र के सामने अनेक जटिल समस्याओं को खड़ा करने में सदा तत्पर और सक्षम रहेगा।