“गीता” : एक ‘मानवीय ग्रंथ’ … एक ‘समग्र जीवन दर्शन’ … व ‘मानव समाज की अप्रतिम धरोहर’

“गीता” का शाब्दिक अर्थ केवल गीत अर्थात् जो गाया जा सके से लिया जाता है । किन्तु आतंरिक रूप से इसका अर्थ है कि जिसने अपने गीत को पा लिया है, स्वयं के छन्द को जान लिया है, स्वच्छंद हो गया है । माना जाता है कि पूर्व अध्यात्म की यात्रा पर ध्यान केन्द्रित करता है और पश्चिम विज्ञान की । किन्तु सत्यता इससे भी गूढ़ है । गीता के द्वारा मनुष्य अध्यात्म और विज्ञान, दोनों ही की पराकाष्ठा को प्राप्त कर लेता है ।

धर्म क्षेत्रे कुरुक्षेत्रे

‘गीता’ किसी विशेष धर्म या संप्रदाय की पुस्तक नहीं है ।अपितु यह एक एक जीवंत ग्रन्थ है। जिसका दृष्टिकोण विश्चजनीन है| ज्ञान-यज्ञ का यह ग्रन्थ मानव-मात्र के हित के लक्ष्य से प्रेरित है। आज ‘योग’ जिस तरह पतंजलि के सूत्रों के कारण,भारत और हिन्दू धर्म की परिधि में सीमित न रहकर सम्पूर्ण संसार में ग्राह्य हो गया है, उसी तरह ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ भी अपने देश-काल को लाँघकर सम्पूर्ण विश्व की वैचारिक संपत्ति बन गई है । अध्यात्म और कर्म अथवा निवृत्ति एवम् प्रवृत्ति के द्वंद को समाहित करनेवाली यह कृति मानव-जीवन की चरितार्थता की खोज करती है । चतुर्दिक व्याप्त संघर्ष और दिग्भ्रम के वातावरण में इसकी उपयोगिता एक औषधि की तरह है।
महाभारत के अंत में एक विशेष प्रसंग आता है जहाँ अर्जुन कृष्ण से पुनः गीता सुनाने को कहते हैं, क्योंकि जो ज्ञान दिया गया था, अर्जुन को उसकी विस्मृति हो गई थी । तब कृष्ण कहते हैं-
‘‘न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमषेशत: ।
परं हि ब्रह्म कथितं योग युक्तेन तन्मया ॥
(महा/अश्‍वमेधिकपर्व/अनुगीता/अध्याय १६)
अर्थात् वह उपदेश, उसी रूप में दोहराना मेरे वश में नहीं; क्योंकि उस समय, योगयुक्त होकर मैंने उस ब्रह्मविद्या का वर्णन किया था|
इस वक्तव्य से स्पष्ट होता है कि गीता का सम्पूर्ण ज्ञान ध्यान की उच्च अवस्था में प्रदान किया गया था । अतः ध्यान के द्वारा प्राप्त गीता का ज्ञान मानव कल्याण के लिए ही उत्पन्न हुआ है ।

कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में विषादग्रस्त अर्जुन को मोह और अवसाद से मुक्त किया था। आज भी ‘महाभारत’ चल रहा है । लोग किंकर्तव्य विमूढ़ हैं । वे कर्म और उद्देश्य से कटकर निरर्थक विचारों के ऊहापोह में डूब गए हैं । ऐसे संशयग्रस्त समय में ‘गीता’ मार्गदर्शिका के रूप में सामने है । अनिर्णय में झूलनेवाले का व्यक्तित्व खंडित हो जाता है । मानसिक दृष्टि से टूटे हुए लोग समाज, देश और संसार का कल्याण नहीं कर सकते हैं । ‘गीता’ उन भग्नचित व्यक्तियों का उपचार करने में समर्थ है।

‘महाभारत’ का ‘अन्धायुग’ अभी समाप्त नहीं हुआ है । सत्तासीन जन धृतराष्ट्र की तरह बेचारे हैं।वे केवल निष्क्रिय बुद्धिजीवी संजय से ‘कुरुक्षेत्र’ की कथा पूछते हैं।नारी-शक्ति के नेत्रों पर गांधारी की पट्टी बँधी हुई है।अनेक झंडे उड़ रहे हैं।वाहनों की विपुलता है।विविध शंखध्वनियाँ गूँज रही हैं।गांडीव का गौरव गल रहा है।अर्जुन अवसन्न है। द्वापर का यह दृश्य सर्वत्र देखा जा सकता है।मनुष्यता को मार्ग नहीं मिल रहा है।ऐसी स्थिति में ‘गीता’ के संदेशों की प्रासंगिकता सभी देशों में अनुभूत ही रही है।

‘गीता’ आकारतः छोटी पुस्तक है, किन्तु उसकी लपेट में सम्पूर्ण त्रिलोक और त्रिकाल है। जिस तरह कृष्ण की विभूतियॉं सर्वत्र फैली हुई हैं और उनके विराट रूप में सब-कुछ समाविष्ट है उसी तरह ‘गीता’ विविध विचारों के बीच संतुलन के उस सेतु की प्रतीति कराती है, जिस पर सभी रंगों, नस्लों, और राष्ट्रों के लोंगों को चलने की स्वतंत्रता है।

‘गीता’ जहाँ एक ओर काव्य प्रतीत होती है वहीँ दूसरी ओर समाज के यथार्थ को संबोधित भी करती है | सभी के प्रश्नों की उत्तर-कुंजिका है यह । प्रश्न चाहे निजी हो, सत्ता का हो, विज्ञान का हो, आधुनिकता का हो, श्रद्धा व विशवास का हो अथवा अध्यात्म के रस से परिपूर्ण हो- उत्तर गीता में दृष्टव्य है । इसी कारण से यह ग्रन्थ किसी कवि के द्वारा लिखी गई निजी संपत्ति नहीं है अपितु मानव सभ्यता की सम्पति होती है । जिस तरह शेक्सपियर केवल इंगलैण्ड के नहीं हैं और तुलसीदास पर हिन्दी का ही हक़ नहीं है उसी तरह ‘व्यास’ एवम् ‘गीता’ को हम केवल संस्कृत तथा भारत से जोड़ने का अपराध नहीं कर सकते हैं । विश्व की साझी विरासत के रूप में ‘गीता’ की महत्ता अक्षुण्ण है । अध्यात्म के फलक पर लोक-शिक्षण की इस रचना में उपनिषदों का पोषक दुग्ध संचित है । इस वैचारिक आहार पर हिन्दू,जैन,बौद्ध, यहूदी, मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि सभी समुदायों का अधिकार है।इसका काव्यत्व सबके लिए आधारक और तोषप्रद है। निश्चय ही पूरी मानवता इससे प्रेरणा ले सकती है।

अल्प शब्दों में कहें तो ‘गीता’ एक “मानवीय-ग्रन्थ” है और एक सार्वजनीन “समग्र मानवीय जीवन-दर्शन” भी है।

यद्यपि “गीता” की व्यापकता, प्रभाव व संस्कार मानव जीवन में असीमित व अनन्त है ।”गीता” की सार्वभौमिकता व सर्वव्याप्तता को ध्यान में रख आज एक सीमित परिचर्चा निम्नांकित विषयों पर की जा सकती है।
राष्ट्रिय / सामाजिक / वैयक्तिक जीवन के विभिन्न पहलुओ पर चंद निम्न श्लोक पूर्ण मार्ग दर्शन करते है जो हर स्तर के प्रबंधन की सम्पूर्ण कुंजी है.
Geeta is a management gospel covering every aspect of life, be it national level, society level or individual level. It gives the direction to handle various aspects of life and provides guidelines for every individual in respect of his duties and rights.

1. Good Governance and social setup
सुसाषन वैयक्तिक लक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था – गीता श्लोक 3.21
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥३- २१॥

2 . Duties of state towards law and order for the benefit of society
समाज विधायक निति और उसका उद्देश्य
गीता श्लोक 4.8
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥

3 . Self-development and its role in social order
नागरिक जीवन का चरमोत्कर्ष एवं सामाजिक व्यवस्था में उसका योगदान – गीता 6.5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥६- ५॥

4. Doctrine of right to act and concept of freewill
स्वतन्त्र समाज में वैयक्तिक अधिकार – गीता 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥२- ४७॥
5. Philosophy of detachment in life as attachment leads to unrest
तृष्णा एवं लालसा से सामाजिक अव्यवस्था व असहिष्णुता का जन्म – गीता 2.62
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥२- ६२॥
6.– Fallacy in change of religion – clear guideline
धर्मं परिवर्तन एक अनावश्यक व अवनति का मार्ग – गीता 3.35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥३- ३५॥

7. Law of co-existence and concept of brotherhood – Live and let live
वसुधैव कुटुम्बकम का सिद्धांत – गीता 6. 30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६- ३०॥

8. No place for ill will in society
भारतीय सामाजिक व्यवस्था ईर्ष्या व द्वेष का स्थान नहीं – गीता 5.3
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥५- ३॥

9. Ideal living order for individuals
आदर्श जीवन व्यवस्था – गीता 2.38
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥२- ३८॥

 

आई आई एम से लेकर दूसरे मैनेजमेंट स्कूल्स तक में गीता को प्रबंधन की किताब के रुप में पहचान मिली है। गीता दुनिया के उन चंद ग्रंथों में शुमार है जो आज भी सबसे ज्यादा पढ़े जा रहे हैं और जीवन के हर पहलू को गीता से जोड़कर व्याख्या की जा रही है। कुरुक्षेत्र में युद्ध के मुहाने पर खड़ी कौरवों और पांडवों की सेना के बीच भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया वो गीता माना गया है।
आखिर गीता में ऐसा क्या है जो उसे इतना पढ़ा जाता है। इसके 18 अध्यायों के करीब 700 श्लोकों में हर उस समस्या का समाधान है जो कभी ना कभी हर इंसान के सामने आती है। आज हम आपको गीता के कुछ चुनिंदा प्रबंधन सूत्रों से रू-ब-रू होते हैं-

श्लोक-
योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय। सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योगयुक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र – धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म के नाम पर हम अक्सर सिर्फ कर्मकांड, पूजा-पाठ, तीर्थ-मंदिरों तक सीमित रह जाते हैं। हमारे ग्रंथों ने कर्तव्य को ही धर्म कहा है। भगवान कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिकाकर काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति का वास होगा। मन में शांति होगी तो परमात्मा से आपका योग आसानी से होगा। आज का युवा अपने कर्तव्यों में फायदे और नुकसान का नापतौल पहले करता है, फिर उस कर्तव्य को पूरा करने के बारे में सोचता है। उस काम से तात्कालिक नुकसान देखने पर कई बार उसे टाल देते हैं और बाद में उससे ज्यादा हानि उठाते हैं।

श्लोक-
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।।
योगरहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावनारहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा।
मैनेजमेंट सूत्र – हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसे सुख प्राप्त हो, इसके लिए वह भटकता रहता है, लेकिन सुख का मूल तो उसके अपने मन में स्थित होता है। जिस मनुष्य का मन इंद्रियों यानी धन, वासना, आलस्य आदि में लिप्त है, उसके मन में भावना ( आत्मज्ञान) नहीं होती। और जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होती, उसे किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिलती और जिसके मन में शांति न हो, उसे सुख कहां से प्राप्त होगा। अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है।

श्लोक-
विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।
निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।
जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है।
मैनेजमेंट सूत्र – यहां भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। हम जो भी कर्म करते हैं, उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। अपनी पसंद के परिणाम की इच्छा हमें कमजोर कर देती है। वो ना हो तो व्यक्ति का मन और ज्यादा अशांत हो जाता है। मन से ममता अथवा अहंकार आदि भावों को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी।

श्लोक-
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।
कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।
मैनेजमेंट सूत्र – बुरे परिणामों के डर से अगर ये सोच लें कि हम कुछ नहीं करेंगे, तो ये हमारी मूर्खता है। खाली बैठे रहना भी एक तरह का कर्म ही है, जिसका परिणाम हमारी आर्थिक हानि, अपयश और समय की हानि के रुप में मिलता है। सारे जीव प्रकृति यानी परमात्मा के अधीन हैं, वो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगी। और उसका परिणाम भी मिलेगा ही। इसलिए कभी भी कर्म के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए, अपनी क्षमता और विवेक के आधार पर हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए।

श्लोक-
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।
तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।
मैनेजमेंट सूत्र- श्रीकृष्ण अर्जुन को माध्यम से मनुष्यों को समझाते हैं कि हर मनुष्य को अपने-अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए जैसे- विद्यार्थी का धर्म है विद्या प्राप्त करना, सैनिक का कर्म है देश की रक्षा करना। जो लोग कर्म नहीं करते, उनसे श्रेष्ठ वे लोग होते हैं जो अपने धर्म के अनुसार कर्म करते हैं, क्योंकि बिना कर्म किए तो शरीर का पालन-पोषण करना भी संभव नहीं है। जिस व्यक्ति का जो कर्तव्य तय है, उसे वो पूरा करना ही चाहिए।

श्लोक-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता है, उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र- यहां भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद व गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा, सामान्य मनुष्य भी उसी की नकल करेंगे। जो कार्य श्रेष्ठ पुरुष करेगा, सामान्यजन उसी को अपना आदर्श मानेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर किसी संस्थान में उच्च अधिकार पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं तो वहां के दूसरे कर्मचारी भी वैसे ही काम करेंगे, लेकिन अगर उच्च अधिकारी काम को टालने लगेंगे तो कर्मचारी उनसे भी ज्यादा आलसी हो जाएंगे।

श्लोक-
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।
ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ और सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही करावे।
मैनेजमेंट सूत्र – ये प्रतिस्पर्धा का दौर है, यहां हर कोई आगे निकलना चाहता है। ऐसे में अक्सर संस्थानों में ये होता है कि कुछ चतुर लोग अपना काम तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन अपने साथी को उसी काम को टालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं या काम के प्रति उसके मन में लापरवाही का भाव भर देते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो अपने काम से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। संस्थान में उसी का भविष्य सबसे ज्यादा उज्जवल भी होता है।

श्लोक-
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।
हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
मैनेजमेंट सूत्र- इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।

श्लोक-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।
मैनेजमेंट सूत्र- भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकार अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

19/11/2015